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यहां बच्चियां असुरक्षित हैं

Mon, 22 Apr 2013 12:33 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Mon, 22 Apr 2013 12:33 PM IST
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here children are insecure

करीब चार महीने पहले हुई दिल्ली गैंगरेप की दुखद घटना के बाद राजधानी के ही गांधीनगर में एक बच्ची के साथ हुई बर्बरता बताती है कि सिर्फ कानून बदल देने से स्थिति नहीं बदल जाती।

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जो नया सख्त कानून बनाया गया है, उसमें बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज न करने वाले पुलिस वालों के खिलाफ भी सजा का प्रावधान है। लेकिन गांधीनगर की घटना में पुलिस वालों ने बच्ची के माता-पिता की कोई मदद तो नहीं ही की, मामले को रफा-दफा करने की सलाह भी दे डाली।
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इससे पहले उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में बलात्कार के बाद एक बच्ची की हत्या के विरोध में जब लोग लड़क पर उतरे, तो बुजुर्ग औरतों को पीटते पुलिस वालों ने निर्ममता की सारी सीमाएं तोड़ दीं। दिल्ली में ही एक लड़की को बंधक बनाकर गैंगरेप करने के मामले में पुलिस असहयोग का ही नतीजा है कि आज पीड़िता मौत से जूझ रही है।
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बलात्कारियों में सख्त सजा का डर न होना चौंकाने वाला है, तो पुलिस वालों में नए कानून की उपेक्षा और मानवीय संवेदना का अभाव उतना ही स्तब्ध करने वाला है। अलबत्ता बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के बीच उस राजनीतिक तंत्र का व्यवहार भी कम निंदनीय नहीं है, जो सिर्फ सख्त कानून को समाधान मानकर चुप बैठ गया है।

देश की राजधानी में नागरिक सुरक्षा का एक मजबूत तंत्र होना ही चाहिए। पर यहां तो किरायेदारों की जांच-पड़ताल की व्यवस्था भी कब दम तोड़ गई, पता नहीं। राजधानी के पुलिस थानों में ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए कि एक भी शिकायत अनसुनी न रहने पाए?

लिहाजा पुलिस आयुक्त के इस्तीफे की मांग तो ठीक है, पर जहां बच्चियां सुरक्षित नहीं हैं, उस राज्य की महिला मुख्यमंत्री यह कहकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकतीं कि पुलिस-प्रशासन उनके हाथ में नहीं है!

मुख्य विपक्षी पार्टी का रवैया तो और भी देखने लायक है, जिसका महिला मोर्चा शुरुआती निष्क्रियता के बाद 10, जनपथ की घेरेबंदी के लिए निकल पड़ता है! इन सबके बजाय महिलाओं की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है।


इसके लिए खुद समाज को भी सजग और संवेदनशील होना पड़ेगा। महिलाओं की सुरक्षा के लिए जब तक खुद हम चौकस नहीं होंगे, पड़ोस की बच्चियों के बारे में फिक्र नहीं करेंगे, तब तक शायद ही कोई कानून कारगर साबित हो।

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