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गर्मी बन गई आफत

Tue, 26 May 2015 08:00 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Tue, 26 May 2015 08:00 PM IST
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heat become scourge

उत्तर भारत के अनेक राज्यों सहित देश का बड़ा हिस्सा भीषण गर्मी की चपेट में है, जिसकी वजह से सात सौ से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। गर्मी की सर्वाधिक मार झेल रहे दक्षिणी राज्यों तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में पिछले एक पखवाड़े के दौरान सबसे अधिक मौतें दर्ज की गई हैं, वहीं लू और गर्म हवाओं ने ओडिशा से लेकर राजस्थान और झारखंड से लेकर उत्तर प्रदेश और पंजाब तक को अपनी जद में ले लिया है।

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मई के महीने में पारे का 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचना बहुत सामान्य है, लेकिन कई जगह तापमान औसत से पांच डिग्री सेल्सियस से अधिक दर्ज किया गया है। यही नहीं, राजधानी दिल्ली के पालम क्षेत्र में तो पारा 46 डिग्री और इलाहाबाद में 48 डिग्री को छू चुका है।
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भौगोलिक अवस्थिति के कारण भारत सामान्य तौर पर गर्म क्षेत्र है, लिहाजा यहां लोग गर्मी सहने के आदी हैं, लेकिन अभी तो लू के थपेड़े कहर बरपा रहे हैं। इससे पहले 2010 में गर्मी का प्रकोप देखा गया था, जब अमेरिका और फ्रांस से लेकर चीन तक इससे हलकान हो गए थे। उस वर्ष भारत में भी करीब ढाई सौ लोगों की भीषण गर्मी की वजह से मौत हो गई थी। उसके बरक्स देखें, तो इस बार गर्मी कहीं अधिक जानलेवा साबित हो रही है।
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ग्लोबल वार्मिंग की तमाम अकादमिक बहसों के बीच यह सच है कि आज भी अपने देश में गर्मी से बचने के पारंपरिक उपायों के अलावा कोई व्यवस्था नहीं दिखती। गर्मी को तो नियंत्रित नहीं किया जा सकता, लेकिन उससे बचने के संस्थागत उपाय जरूर किए जा सकते हैं। इसका एक अच्छा उदाहरण अहमदाबाद के नगर निगम ने पेश किया है। उसने गर्मी से बचने के लिए एक 'हीट अलर्ट सिस्टम' विकसित किया है, जिसके जरिये गर्मी के असर को कई स्तरों में बांटा गया है और उसके मुताबिक मीडिया, मोबाइल फोन और सोशल नेटवर्किंग के जरिये चेतावनी दी जाती है। इस तंत्र से स्वास्थ्य सेवा को भी जोड़ा गया है, जिससे पीड़ितों तक तत्काल राहत पहुंचाई जा सके।


इस पहल को दूसरी जगहों में भी अमल में लाया जा सकता है। यह विडंबना ही है कि बाढ़ हो या शीतलहर या फिर गर्मी, उससे सर्वाधिक प्रभावित सामाजिक और आर्थिक रूप से निचले क्रम के लोग ही होते हैं। क्या सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में गर्मी के इस कहर को प्राकृतिक आपदा घोषित नहीं किया जाना चाहिए?

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