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नुकसानदेह जिद
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Mon, 22 Dec 2014 08:43 PM IST
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संसद के शीतकालीन सत्र को एक दिन रह गया है, मगर राज्यसभा में जारी गतिरोध के कारण सरकार कुछ अहम विधेयकों को पारित नहीं करवा पा रही है। दरअसल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके आनुषांगिक संगठन तथा भाजपा के अनेक नेताओं की ओर से धर्मांतरण और 'हिंदू राष्ट्र' को लेकर जिस तरह के बयान आए हैं, उससे संसद के भीतर सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा हो गई है।
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नरेंद्र मोदी की अगुआई में भाजपा को लोकसभा चुनाव में मिली भारी विजय के बाद से ही संघ परिवार का एक वर्ग इसे हिंदुत्व की जीत के रूप में देखता आया है और संघ के 'घर वापसी' कार्यक्रम में आई तेजी इसी की परिणति है। जाहिर है, संसद में काम ठप होने से मोदी सरकार के विकास और सुशासन का एजेंडा भी कमजोर पड़ रहा है।
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निश्चय ही धर्मांतरण एक व्यापक विषय है और यह सिर्फ धार्मिक अस्मिता का मामला नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध गरीबी, उत्पीड़न और सामाजिक बहिष्कार से भी है। इस विषय पर संघ परिवार की जो भी राय हो, लेकिन 'सबका साथ सबका विकास' के वायदे के साथ सत्ता में आई मोदी सरकार के लिए यह सबसे अहम समय है। जल्द ही उसे अपना पहला पूर्ण बजट पेश करना है और अपनी 'मेक इन इंडिया' जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं के लिए निवेश जुटाना है। चूंकि लोकसभा में उसका बहुमत है, इसलिए उसे वहां कोई अड़चन नहीं हो रही है और उसने इसी सत्र में 17 विधेयक पारित भी करवा लिए। पर राज्यसभा में बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा 26 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी करने, सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से प्रभावित कोयला खदानों का नए सिरे से आवंटन करने और दिल्ली में अवैध कॉलोनियों को वैध करने से संबंधित महत्वपूर्ण बिल अटके हुए हैं।
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पिछले हफ्ते से राज्यसभा में कोई काम नहीं हुआ है और हालत यह हो गई है कि वित्त मंत्री तक को जीएसटी जैसे अहम विधेयक को बजट सत्र के लिए रखना पड़ा है। असल में मोदी सरकार के खिलाफ विपक्षी दलों के हाथ 'घर वापसी' के रूप में पहला बड़ा मुद्दा लगा है, जिसे वह जाने नहीं देना चाहते। पर यह वाकई विचित्र स्थिति होगी कि लोकसभा में बहुमत के बावजूद मोदी सरकार को इन अहम विधेयकों के लिए अध्यादेश लाना पड़े! सरकार के प्रबंधकों को गौर करना चाहिए कि संघ परिवार का एजेंडा कहीं सरकार के एजेंडे पर हावी न हो जाए।