फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Other Archives ›   Harm to dignity

गरिमा पर आंच

Mon, 14 Apr 2014 08:22 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Mon, 14 Apr 2014 08:22 PM IST
विज्ञापन
Harm to dignity

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तीन जनवरी को अपनी बहुचर्चित प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि विपक्ष और मीडिया की तुलना में इतिहास उनके प्रति कहीं अधिक उदारता बरतेगा और उनके एक दशक लंबे कार्यकाल का आकलन करेगा। मगर हाल में ही आई दो किताबें, उनके पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू की एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर और पूर्व कोयला सचिव और कोयला घोटाले में आरोपी पी सी पारेख की क्रूसेडर आर कांस्पिरेटर इस बात की तस्दीक करती हैं कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के रूप में स्वतंत्र रूप से कोई फैसला नहीं ले सके।

विज्ञापन


चुनाव के समय आई इन दोनों किताबों के राजनीतिक और व्यावसायिक निहितार्थ हो सकते हैं, मगर मोटे तौर पर देखें, तो इनमें ऐसा कुछ नया नहीं है, जिनके बारे में पहले कहा या लिखा न गया हो। हालांकि प्रधानमंत्री कार्यालय और कांग्रेस पार्टी सत्ता के दो केंद्र होने से इन्कार करते रहे हैं, मगर न तो सरकार और न ही पार्टी यह आम धारणा बदल सकी। दरअसल ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि मनमोहन सिंह राजनीतिक तौर पर कभी मजबूती से अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं कर सके, जिससे मंत्रियों पर भी उनका नियंत्रण नहीं रहा। उन्हें हमेशा कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के नियुक्त किए प्रधानमंत्री के रूप में ही देखा गया।
विज्ञापन


पारेख लिखते हैं कि जब उन्होंने जेपीसी के सदस्य धर्मेंद्र प्रधान के द्वारा अपमानित होने के बाद कोयला सचिव के पद से इस्तीफा दिया था, तब मनमोहन सिंह ने उनसे कहा था कि उन्हें भी रोजाना ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ता है, मगर ऐसे मुद्दे पर इस्तीफा देना राष्ट्रहित में नहीं होगा। सवाल है कि क्या खुद प्रधानमंत्री ने यह स्थिति स्वीकार की? आखिर उन्होंने ऐसी स्थिति क्यों आने दी कि उनके फैसलों को सोनिया और राहुल गांधी अपनी मर्जी से प्रभावित करते रहे?
विज्ञापन
विज्ञापन


इसके साथ ही अपने सबसे कठिन चुनाव का सामना कर रही कांग्रेस को भी सोचना चाहिए कि उसकी यह हालत इसलिए हुई, क्योंकि उसका नेतृत्व जिम्मेदारी लेने से बचता रहा है। इससे प्रधानमंत्री पद की गरिमा पर आंच आई है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने बारू और पारेख के आरोपों को सिरे से नकारा है, मगर यह पता नहीं कि व्यक्तिगत तौर पर मनमोहन सिंह इसे किस तरह ले रहे हैं। सक्रिय राजनीति से हटने के बाद क्या वह भी किसी किताब के जरिये अपना पक्ष रखेंगे?

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed