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एक साहसी फिल्मकार का जाना

Thu, 30 May 2013 09:47 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Thu, 30 May 2013 09:47 PM IST
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go away of a daring filmmaker

अपनी पहली ही फिल्म हीरेर आंग्टी (हीरे की अंगूठी) से रचनात्मकता का परिचय देने वाले और दूसरी ही फिल्म उनिशे एप्रिल के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाजे जाने वाले रितुपर्णो घोष की अनुपस्थिति सिर्फ बांग्ला ही नहीं, भारतीय सिनेमा के लिए भी खलने वाली है।

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करीब दो दशक पहले अपनी पहली फिल्म बनाने वाले रितुपर्णो ने बहुत प्रयोग बेशक न किए हों, पर उनकी फिल्मों ने समाज की उत्तरजीविता और व्यक्तिगत रिश्तों को बखूबी रेखांकित किया है। हालांकि फिल्मकार पिता की वजह से उनमें सिनेमा के संस्कार बचपन से ही थे, लेकिन वह सत्यजीत राय और ऋत्विक घटक जैसे दिग्गज फिल्मकारों की फिल्मों से प्रभावित होकर सिनेमा से जुड़े।
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मगर उनकी फिल्में इन दोनों महान फिल्मकारों से इतर अलग मुकाम बनाती हैं, जिनमें शहरी निम्न मध्यवर्गीय जीवन की जद्दोजहद देखी जा सकती है। उनकी फिल्मों ने स्त्री विमर्श को आगे बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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फिर वह मां-बेटी के रिश्ते पर केंद्रित उनिशे एप्रिल हो या फिर कोलकाता की सड़कों पर एक महिला के साथ हुए उत्पीड़न की सच्ची घटना पर केंद्रित दहन या फिर ऐश्वर्य राय के साथ बनाई गई चोखेर बालि, उन्होंने अपने काम से कभी समझौता नहीं किया।

उन्हें मिले एक दर्जन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार इसकी तस्दीक करते हैं। उन्हें बांग्ला सिनेमा में नवजागरण लाने का श्रेय भी दिया जाता है, तो इसलिए क्योंकि उन्होंने फिल्मों से विमुख हो रहे बंगाली भद्रलोक को दोबारा सिनेमा हॉल की ओर मोड़ा।

वास्तव में उन्होंने सिनेमा को नए तरीके से परिभाषित करने की कोशिश की, जिसकी छाप लंबे समय तक बनी रहेगी। इस उत्तर आधुनिक समय की नब्ज को उन्होंने समझा और कई बार लगा कि वह समय से आगे भी हैं। उनकी इस प्रतिभा की झलक निर्देशक और नायक, दोनों ही रूपों में नजर आई।


वह अपने पहनावे और यौनिक व्यवहार को लेकर चर्चा में भी रहे, मगर उन्होंने वही किया, जो वह करना चाहते थे। रुपहली दुनिया में वह उन चुनींदा लोगों में से थे, जिनका जीवन पारदर्शी कहा जा सकता है। यदि उनके निधन की खबर से बांग्ला सिनेमा जगत और बॉलीवुड स्तब्ध है, तो इसलिए भी, क्योंकि वह अपने रचनात्मक उत्कर्ष पर थे।

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