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गतिरोध से आगे निकलें

Fri, 24 Jul 2015 08:38 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 24 Jul 2015 08:38 PM IST
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Go ahead from this deadlock

अपेक्षाकृत छोटे, करीब तीन सप्ताह, के मानसून सत्र के शुरुआती चार दिन जिस हंगामे में बगैर कामकाज के बीते हैं, वह न सिर्फ निराशाजनक है, बल्कि यह विधायी कार्यों के प्रति हमारे जनप्रतिनिधियों की उदासीनता का भी उदाहरण है। सिर्फ यही नहीं कि केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्रियों के इस्तीफों की कांग्रेस की पुरानी मांग के पीछे कोई नया खुलासा या तर्क नहीं है, जिसकी शर्त पर ही वह संसद को चलने देने की इच्छुक है, यह भी कि अपने इस दुराग्रही अभियान में उसे दूसरी पार्टियों का समर्थन भी नहीं मिल रहा।

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बुधवार को गांधी प्रतिमा के सामने धरना देने का कार्यक्रम उसे इसी कारण आखिरी वक्त में स्थगित करना पड़ा। शुक्रवार को सुष्मिता देव और कल्याण बनर्जी की झड़प में तो यह सार्वजनिक ही हो गया कि मंत्रियों के इस्तीफों की कांग्रेस की मांग को तृणमूल का समर्थन नहीं है। इसके बावजूद कांग्रेस न केवल इस्तीफों की जिद पर अड़ी है, बल्कि राहुल गांधी ने सुषमा स्वराज को अपराधी बताकर माहौल को और गर्मा दिया है, जिससे बचना चाहिए था। अलबत्ता कांग्रेस उपाध्यक्ष की टिप्पणी पर नाराज भाजपा को याद करना चाहिए कि यूपीए सरकार के दोनों कार्यकालों में खुद उसने भी भ्रष्टाचार के मामलों में नाम आने पर संबंधित मंत्रियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी।
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भाजपा को यह समझना चाहिए कि वह अब विपक्ष में नहीं, सरकार में है, लिहाजा पिछली सरकार के समय के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर वह अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बच सकती। यह साफ नजर आता है कि सत्ताधारी पार्टी होने के कारण संसद का कामकाज सुचारु रूप से चलाने की जो जिम्मेदारी राजग पर है, उसमें वह कहीं न कहीं चूक रहा है। कांग्रेस को निशाना बनाने के बजाय उसे उन विरोधी पार्टियों के संकेतों को समझना चाहिए, जो संसद को चलने देने के इच्छुक हैं। मानसून सत्र में समय चूंकि बेहद कम रह गया है, ऐसे में, सरकार को चाहिए कि वह बचे हुए कार्यदिवसों में गतिरोध दूर करने का कोई फॉर्मूला निकाले। इस माहौल में बेशक जीएसटी जैसे विधेयकों पर सर्वसम्मति की गुंजाइश न बने; जिसके लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत है, पर मानसून सत्र के बचे हुए समय में कुछ कामकाज तो हो।

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