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शांति को एक मौका दीजिए
नई दिल्ली
Updated Thu, 21 Nov 2013 08:47 PM IST
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ईरान का तीन दशक पुराना अंतरराष्ट्रीय वनवास खत्म करने के लिए बराक ओबामा आज उसी नेतृत्वकारी भूमिका में दिखाई दे रहे हैं, जिस तरह की भूमिका पश्चिम एशिया समस्या के समाधान के लिए कभी बिल क्लिंटन ने अख्तियार की थी।
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हालांकि खुद ईरान भी इस समय पश्चिमी देशों के साथ समझौता करने को आतुर दिख रहा है। इसकी एक वजह तो दशकों के अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध से जर्जर हुई अर्थव्यवस्था है, और दूसरा कारण है, हसन रोहानी के रूप में एक व्यावहारिक राष्ट्रपति का आना। परमाणु शक्तिसंपन्न देशों के साथ ईरान का समझौता हो जाता है, तो इसका ज्यादा लाभ उसे ही होगा। ऐसे में, वहां के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह अली खमेनई इस्राइल को भला-बुरा कहते हुए ईरान के पुराने कठोर रुख का जैसा संकेत दे रहे हैं, वह दुर्भाग्यपूर्ण है।
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उनके तेवर देखते हुए देश के युवा उनके समर्थन में एकजुट हो रहे हैं। उन्हें समझना चाहिए कि लंबी शत्रुता ईरान के लिए ज्यादा नुकसानदेह है। यह ठीक है कि उसे एक सीमा से अधिक नहीं झुकना चाहिए। लेकिन परमाणुशक्ति संपन्न देश उसके स्वाभिमान पर हमला कहां कर रहे हैं? हां, यूरेनियम संवर्द्धन की सीमा तय करने के अलावा ईरान को अपने परमाणु संस्थानों को अंतरराष्ट्रीय निगरानी के लिए खोलना ही होगा।
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ताकतवर देशों में केवल फ्रांस ही ईरान के प्रति सख्त है और पिछली बैठक में उसके खिलाफ वीटो कर चुका है। लेकिन इस सख्ती के पीछे उसका स्वार्थ ही अधिक है; वह सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों को हथियार बेचता है, और वे नहीं चाहते कि ईरान को राहत दी जाए। इस्राइल भी इन देशों के साथ मिलकर संभावित समझौते को विफल करने की कोशिश में है। जबकि अमेरिका के अलावा चीन और ब्रिटेन समझौते के पक्ष में हैं। ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने तो इस संदर्भ में रोहानी के साथ टेलीफोन पर बातचीत भी की।
चूंकि अमेरिका और यूरोपीय संघ ईरान को राहत देना चाहते हैं, ऐसे में, लाजिमी तो यही है कि फ्रांस अपना रुख लचीला बनाए। लेकिन समझौते तक पहुंचना बहुत कुछ ईरान के रवैये पर भी निर्भर करेगा। और समय का तकाजा यही है कि ईरान इस मामले में अपने राष्ट्रपति के साथ एकजुट हो।