फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Other Archives ›   gdp growth rate for this fiscal to cross five percent

पटरी से उतरती उम्मीदें

Sat, 09 Feb 2013 12:43 AM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Sat, 09 Feb 2013 12:43 AM IST
विज्ञापन
gdp growth rate for this fiscal to cross five percent

नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिग्लिट्ज की प्रसिद्ध उक्ति है, जीडीपी से अर्थव्यवस्था की संवहनीयता का पता नहीं चलता। असल में चालू वित्त वर्ष में विकास दर को लेकर जितने भी अनुमान जताए गए हैं, उनसे वाकई अर्थव्यवस्था की सेहत का अनुमान लगाना कठिन है।

विज्ञापन


भारतीय रिजर्व बैंक, वित्त मंत्री, योजना आयोग और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के साथ ही साख एजेंसियों तक ने भारत की अर्थव्यवस्था के बारे में हाल के महीनों में अलग-अलग अनुमान व्यक्त किए हैं। मगर, केंद्रीय सांख्यिकी संगठन ने चालू वित्त वर्ष में आर्थिक विकास दर के सिर्फ पांच फीसदी रहने का अनुमान जताकर अर्थव्यवस्था की हौलनाक तस्वीर पेश की है।
विज्ञापन


यह 2002-03 के दौरान की चार फीसदी की विकास दर के बाद न केवल बीते एक दशक में सबसे कम है, बल्कि इसने 12 वीं पंचवर्षीय योजना के सुस्त पड़ने का अंदेशा भी पैदा कर दिया है। हालांकि मुख्य आर्थिक सलाहकार रघुराम राजन इस अनुमान से बहुत इत्तफाक नहीं रखते और उनका कहना है कि यह देश की क्षमता से काफी कम है और नीतियों को इस तरह आगे बढ़ाने की जरूरत है, ताकि आठ फीसदी विकास दर हासिल की जा सके। सवाल है कि गड़बड़ी कहां है।
विज्ञापन
विज्ञापन


सरकार बीते दो वर्षों से निवेश का रोना रो रही है, लेकिन वह आज भी नीतिगत अपंगता को दूर नहीं कर पाई है। चूंकि आधारभूत संरचना से जुड़ी अनेक महत्वपूर्ण परियोजनाएं जमीन अधिग्रहण बिल सहित विभिन्न कारणों से अटकी पड़ी हैं, इसलिए नए रोजगार का सृजन भी प्रभावित हो रहा है।

जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद के प्रमुख घटक सेवा, विनिर्माण, आधारभूत संरचना और कृषि जैसे क्षेत्रों में स्थिति जल्द नहीं सुधारी गई, तो इसका असर अर्थव्यवस्था पर तो पड़ेगा ही, बेरोजगारी भी बढ़ सकती है। और जैसा कि योजना आयोग के थिंक टैंक इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड मैनपॉवर रिसर्च ने चिंता जताई है, यूपीए की नीतियों के कारण बेरोजगारी बढ़ रही है और करोड़ों लोगों को सामाजिक सुरक्षा के बिना ठेका मजदूर बना दिया गया है।


यह भी चिंता की बात है कि रोजगार का बड़ा जरिया होने वाले कृषि क्षेत्र से लोग दूसरे कामों की ओर विमुख हो रहे हैं और कृषि विकास दर में कमी हमें एक नए संकट की ओर भी ले जा सकती है। मुश्किल यह है कि ऐसे किसी अनुमान का सीधा असर आम लोगों पर पड़ता है, जिन पर सरकार जल्द ही कड़े फैसलों का बोझ लाद सकती है। 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed