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बिहार की बाजी

Wed, 09 Sep 2015 08:35 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 09 Sep 2015 08:35 PM IST
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Game of Bihar

पांच चरणों में होने जा रहे बिहार विधानसभा के चुनाव मई, 2014 में हुए लोकसभा चुनाव के बाद सिर्फ इस राज्य के लिए ही नहीं, बल्कि देश की सियासत के लिहाज से भी सबसे अहम माने जा रहे हैं। हालत यह है कि चुनाव कार्यक्रम की औपचारिक घोषणा से पहले ही यहां का सियासी पारा काफी चढ़ चुका था। दोनों प्रमुख प्रतिद्वंद्वी गठबंधनों, नीतीश कुमार की अगुआई वाले महागठबंधन और एनडीए, में टिकटों का बंटवारा और उम्मीदवारों का चयन भी ठीक से नहीं हुआ है, पर तीखे आरोप-प्रत्यारोप के दौर चल चुके हैं।

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खुद प्रधानमंत्री मोदी की यहां चार रैलियां हो चुकी हैं, वहीं नीतीश कुमार, लालू प्रसाद और सोनिया गांधी भी संयुक्त रैली कर चुके हैं। प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, दोनों ही बिहार के विकास की बात कर रहे हैं, पर सच यह है कि यहां की राजनीति ध्रुवीकरण और जातिवादी जकड़न से बाहर नहीं निकल सकी है। मसलन, नीतीश के विपरीत लालू यादव घूम-फिरकर मंडल की राजनीति और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को केंद्र में ले आते हैं, वहीं भाजपा के नए सहयोगी बने जीतनराम मांझी और रामविलास पासवान के बीच दलितों का असली नेता बनने की होड़ मची हुई है। इसके अलावा भाजपा में ऐसे तत्व भी हैं, जो मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से जब तब हिंदुत्व का मुद्दा उछालते रहते हैं।
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अकबरुद्दीन औवेसी के बिहार में चुनाव लड़ने की घोषणा को भी ध्रुवीकरण की राजनीति के तौर पर ही देखा जा रहा है। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने पहले ही नीतीश-लालू को झटका देकर बिहार की पूरी सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर रखा है, तो छह वामदलों ने भी संयुक्त रूप से मैदान में उतरने की घोषणा कर रखी है। इससे भाजपा और एनडीए विरोधी मतों का ही बंटवारा होगा। इसका सीधा नुकसान नीतीश कुमार को हो सकता है। वहीं यदि मांझी और पासवान के बीच सुलह की स्थिति नहीं बनती है, तो इसका नुकसान एनडीए को उठाना पड़ेगा, क्योंकि राज्य में 20 फीसदी मतदाता दलित हैं।
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मगर असल सवाल तो बिहार के साढ़े छह करोड़ मतदाताओं का है, जिनका भविष्य इन चुनावों से जुड़ा हुआ है। क्या वे जातिवाद और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से बाहर निकलकर सिर्फ विकास के मुद्दे पर साफ-सुथरे उम्मीदवारों को वोट देंगे?

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