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आप से तू-तड़ाक तक
नई दिल्ली
Updated Fri, 27 Mar 2015 08:24 PM IST
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राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से ऐन पहले आम आदमी पार्टी के प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव तथा अरविंद केजरीवाल गुटों के बीच दूरियां इतनी बढ़ गई हैं कि लगता नहीं कि उनमें सुलह हो पाएगी। आंतरिक लोकतंत्र और परस्पर संवाद का दावा करने वाली इस पार्टी की हालत यह हो गई है कि दोनों गुट मीडिया के जरिये एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं।
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शुरुआत किस ओर से हुई, उससे कहीं अहम यह है कि वैकल्पिक और साफ-सुथरी राजनीति का वायदा करने वाली यह पार्टी वर्चस्व और अहंकार की लड़ाई में बुरी तरह उलझ गई है। भारतीय राजनीति में नेताओं के बीच इस तरह के संघर्ष के आख्यान नए नहीं हैं, लेकिन संभवतः ऐसा पहली बार है, जब अपनी ही पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की गोपनीय बातें, चिट्ठियां और फोन कॉल तक सार्वजनिक किए जा रहे हैं!
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यह त्रासद है कि स्टिंग को राजनीतिक हथियार बनाने वाली पार्टी के नेता इसका इस्तेमाल आज एक-दूसरे के खिलाफ कर रहे हैं। वास्तव में भ्रष्टाचार और जनलोकपाल के आंदोलन से पैदा हुई इस पार्टी ने महज दो वर्ष में ही लंबा सफर तय किया है, और इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता कि उसकी इस कामयाबी के पीछे बड़ा चेहरा अरविंद केजरीवाल रहे हैं। दूसरी ओर प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव का रवैया जैसा रहा है, उसमें यह समझा जा सकता है कि वह अरविंद को नेता मानने को तैयार नहीं हैं।
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अच्छा तो यह होता कि वे सार्वजनिक पत्र लिखने और संवाददाता सम्मेलन में बातें रखने के बजाय पार्टी के फोरम पर आवाज उठाते। यही बात केजरीवाल गुट के लिए भी कही जा सकती है कि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र बरकरार रखने के लिए असहमितयों का सम्मान करना जरूरी है। और फिर किस राजनीतिक दल में असहमतियां नहीं होतीं? दिल्ली विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत के साथ सरकार बनाने वाली आम आदमी पार्टी के लिए सुशासन का अच्छा मॉडल प्रस्तुत करने का अवसर है, लेकिन वह आपसी झगड़े में इस कदर उलझ गई है कि इस पार्टी का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया है। भारतीय राजनीति में उम्मीद की तरह उभरी इस पार्टी की यह दुर्गति वाकई दुखद है।