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काबुलीवाले से दोस्ती
नई दिल्ली
Updated Tue, 28 Apr 2015 07:50 PM IST
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भारत प्रवास पर आए अफगानिस्तान के राष्ट्रपति मोहम्मद अशरफ गनी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद आतंकवाद के खिलाफ क्षेत्रीय सहयोग की न केवल बात की है, बल्कि इसे जड़ से खत्म करने की प्रतिबद्धता भी जताई है। निश्चय ही, आतंकवाद से पीड़ित भारत अफगानिस्तान की पीड़ा को बेहतर ढंग से समझता है और वह उसके पुनर्निर्माण में हरसंभव मदद भी कर रहा है।
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लेकिन दोनों देशों के रिश्तों को बदलते भू-राजनीतिक संबंधों के नजरिये से भी देखने की जरूरत है। राष्ट्रपति बनने के सात महीने बाद भारत आए गनी इससे पहले पाकिस्तान, सऊदी अरब, चीन और अमेरिका की यात्रा कर चुके हैं, इससे यह संदेश गया कि भारत उनकी प्राथमिकता में उस तरह नहीं है, जैसा कि उनके पूर्ववर्ती हामिद करजई के समय हुआ करता था। मगर गनी की इस यात्रा से यह धारणा जरूर कमजोर हुई होगी।
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वास्तव में आतंकवाद के खिलाफ भारत की प्रतिबद्धता को लेकर किसी को शक नहीं है। मुश्किल पाकिस्तान से है, जिसे गनी भी समझते होंगे। इसके बावजूद, जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि भारत अफगान-पाकिस्तान ट्रेड ऐंड ट्रांजिट एग्रीमेंट का हिस्सा बन सकता है, ताकि अफगानिस्तान और पूर्वी भारत के बीच सामान की आवाजाही हो सके। यह साझेदारी तीनों देशों के हक में है।
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असल में, सामरिक संबंधों के साथ ही व्यापारिक रिश्ते आज की सबसे बड़ी जरूरत हैं। आखिर चीन ने हाल ही में पाकिस्तान में न केवल 46 अरब डॉलर के भारी निवेश, बल्कि ग्वादर बंदरगाह से सीधे सऊदी अरब तक पहुंच बनाने का ऐलान किया ही है। इससे अफगानिस्तान को किसी तरह का लाभ हो पाएगा या नहीं, कहना कठिन है; पर ईरान में भारत द्वारा किए जा रहे चाहबहार बंदरगाह के निर्माण से अफगानिस्तान के लिए नया व्यापारिक मार्ग जरूर खुल जाएगा।
वास्तव में अफगानिस्तान हमारा एक स्वाभाविक मित्र है और भारत ने उसके सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ ही उसकी सामरिक सुरक्षा के प्रति हमेशा चिंता दिखाई है। भूलना नहीं चाहिए कि दक्षेस में अफगानिस्तान को जोड़ने की पहल भारत ने ही की थी। अफगान राष्ट्रपति गनी ने कवि गुरु रवींद्रनाथ टैगोर की मशहूर कहानी काबुलीवाले का जिक्र कर दोनों देशों के ऐतिहासिक रिश्ते की ही याद दिलाई है, जिसमें दोनों के हित छिपे हैं।