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मित्रता और संदेह
नई दिल्ली
Updated Thu, 14 May 2015 08:21 PM IST
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपने गृहनगर शियान में अगवानी कर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने उसी सौजन्यता का परिचय दिया है, जैसा भारतीय नेता ने पिछले वर्ष अपने गृहनगर अहमदाबाद में चीनी नेता का स्वागत करते हुए दिया था। दोनों नेताओं के बीच एक वर्ष के भीतर यह तीसरी मुलाकात है और निश्चय ही वे अब एक-दूसरे को बेहतर तरीके से समझ पा रहे होंगे। लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और भौगोलिक रूप से नजदीक होने के बावजूद भारत और चीन के संबंध बहुत सहज नहीं रहे हैं।
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दोनों देशों के रिश्तों में सबसे बड़ा रोड़ा सीमा संबंधी विवाद ही है, जिसे अब तक नहीं सुलझाया जा सका है। दोनों नेताओं की मुलाकात के बाद आधिकारिक तौर पर बताया गया है कि उनके बीच निवेश, व्यापारिक संबंधों के साथ ही सीमा संबंधी मसले पर भी बात हुई है। लेकिन यह मसला इतना जटिल है कि 18 दौर की बातचीत के बावजूद अब तक कोई समाधान नहीं निकल सका है।
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दरअसल चीन अरुणाचल प्रदेश पर तो अपना दावा करता ही है, जम्मू-कश्मीर को भी वह विवादित क्षेत्र की तरह देखता है। यही नहीं, अक्साई चीन क्षेत्र में भी उसका कब्जा बरकरार है। यदि उसकी मंशा पर भारत में संदेह जताया जाता रहा है, तो उसके पीछे वजह भी है। भूलना नहीं चाहिए कि जिनपिंग की भारत यात्रा के दौरान ही लद्दाख क्षेत्र में चीनी सैनिक घुस आए थे। हालांकि दोनों पक्षों ने इसे तूल न देकर समझदारी ही दिखाई थी। अभी मोदी के प्रवास के समय चीनी मीडिया में भारत का गलत नक्शा प्रसारित किया गया है!
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दरअसल चीन की चुनौती सिर्फ यह नहीं है कि वह सामरिक रूप से अपना दबदबा कायम करना चाहता है, बल्कि वह इसकी आड़ में अपने आर्थिक और वित्तीय हित भी साधने में जुटा है। पाक अधिकृत कश्मीर से होकर वह पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह में जो आर्थिक गलियारा बना रहा है, उसे इसी रूप में देखना चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए कि मोदी की यात्रा से भारत की आशंकाओं और चिंताओं को दूर करने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही द्विपक्षीय व्यापार का पलड़ा अभी चीन की ओर झुका हुआ है, उसे भी संतुलित करने की जरूरत है। वास्तव में भारत और चीन के बेहतर रिश्ते क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिहाज से भी अहम हैं।