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आयरन लेडी का जाना
नई दिल्ली
Updated Mon, 08 Apr 2013 10:44 PM IST
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यों तो ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर पिछले कई वर्षों से सक्रिय राजनीति से अलग हो चुकी थीं, लेकिन उन्होंने अपने देश की सियासत के साथ ही वैश्विक राजनीति पर जो छाप छोड़ी है, उसे भुलाना मुश्किल होगा। वास्तव में शीत युद्ध के अंतिम दशक के जिन नेताओं को इतिहास में दर्ज किया जाएगा, उनमें मार्गरेट थैचर भी होंगी, जिन्होंने अमेरिका और सोवियत संघ के ताकतवर नेतृत्व के बीच अपनी एक वैश्विक छवि बनाई थी।
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घरेलू स्तर पर अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर के अपने वैचारिक विरोधियों तक का उन्होंने जिस सख्ती से सामना किया, मजदूर यूनियनों को तोड़ने से लेकर महंगाई से निपटने तक जैसा नेतृत्व उन्होंने दिखाया, उसकी वजह से ही उन्हें 'आयरन लेडी' तक कहा गया।
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1979 से 1990 के दौरान 11 वर्षों तक प्रधानमंत्री रहीं थैचर का प्रभाव घरेलू राजनीति से लेकर आर्थिक नीतियों और कूटनीतिक मामलों तक में साफ महसूस किया गया। सत्ता में आने के तुरंत बाद कुछ सरकारी कंपनियों को निजी हाथों में सौंपने का कदम हो या फॉकलैंड पर कब्जे के लिए अर्जेंटीना को खदेड़ने के लिए फौज भेजने का फैसला या आयरलैंड का मसला, उन्होंने हमेशा दृढ़ता और दूरदर्शिता का परिचय दिया।
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कहते हैं सियासत असीमित संभावनाओं का खेल है, जिसे थैचर ने सच कर दिखाया। वह न केवल ब्रिटेन की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं, बल्कि लगातार तीन बार शीर्ष पद पर चुनी जाने वाली बीसवीं सदी की अपने देश की पहली नेता भी साबित हुईं। जबकि यहां तक पहुंचने का खुद उन्हें भी भरोसा नहीं था, जैसा कि उन्होंने 1977 के आसपास दिए एक साक्षात्कार में कहा था, 'मुझे नहीं लगता कि मेरे जीते जी कोई महिला भी प्रधानमंत्री बन पाएगी!'
यह सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं था, बल्कि तब की हकीकत भी थी। कुछ विरोधाभासों और अंतरविरोधों के साथ यह संयोग ही है कि मार्गरेट थैचर भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तरह ही कद्दावर नेता थीं, जिनकी वह खुद भी प्रशंसा करती थीं। थैचर के पहले और बाद में भी अनेक महिलाओं ने अपने देशों का नेतृत्व किया, मगर थैचर ने जैसा नेतृत्व दिया, वैसे उदाहरण कम ही मिलते हैं।