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सिर्फ माफी काफी नहीं

Tue, 01 Jul 2014 07:48 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Tue, 01 Jul 2014 07:48 PM IST
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forgiving is not enough

तृणमूल कांग्रेस के सांसद तपस पाल ने भले ही अपने विवादास्पद बयान के लिए माफी मांग ली है, लेकिन यह पूरा प्रकरण इस बात की तस्दीक करता है कि पश्चिम बंगाल की हिंसा की राजनीतिक संस्कृति को बदलने में ममता बनर्जी नाकाम साबित हुई हैं। वास्तव में अभी हुए लोकसभा चुनाव में चुनाव आयोग को सर्वाधिक चुनौती का सामना पश्चिम बंगाल में ही करना पड़ा था।

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तपस पाल की जिस वीडियो क्लिपिंग को लेकर विवाद हुआ वह कुछ हफ्ते पुरानी बताई जाती है, मगर उसमें वह जो कुछ कहते दिखाई देते हैं, वह सिर्फ अपने राजनीतिक विरोधियों यानी माकपा कार्यकर्ताओं को चुनौती देने भर का मामला नहीं है। अपने विरोधियों के परिवारों की महिलाओं को लेकर वह जिस तरह के उकसाने वाला बयान देते दिखते हैं, वह बेहद आपत्तिजनक है और उसकी सभ्य समाज में कोई जगह नहीं है।
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बेशक, पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का पुराना इतिहास है, जिसने कांग्रेस से लेकर माकपा के लंबे शासन के दौरान सांस्थानिक रूप ले लिया, लेकिन तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद वहां का राजनीतिक तौर-तरीका बिल्कुल नहीं बदला। बल्कि तृणमूल ने विद्वेष की राजनीति को ही आगे बढ़ाया।
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यदि पिछले कुछ महीनों के दौरान के ही तृणमूल और माकपा नेताओं के बयानों पर गौर करें, तो पता चलेगा कि वहां की राजनीतिक भाषा में किस तरह की गिरावट आ चुकी है। मसलन, इसी वर्ष मार्च में तृणमूल नेता सौगत राय ने विपक्षियों यानी माकपा कार्यकर्ताओं को धमकाते हुए कहा था कि 'अर्ध सुरक्षा बल भी उन्हें नहीं बचा सकते, उन्होंने हमारे साथ जैसा किया था, वैसा अब हम उनके साथ करेंगे'!

इसके कुछ दिन पहले ही तृणमूल के एक नेता माकपा कार्यकर्ताओं को चूहा बताते हुए उन्हें जहर देकर मारने की बात की थी। तो दूसरी ओर जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बलात्कार पीड़ितों के लिए मुआवजे की घोषणा की थी, तब एक माकपा नेता उन्हें इंगित करते हुए बेहद आपत्तिजनक बयान दिया था। तृणमूल कांग्रेस ने खुद को पाल के विवादास्पद बयान से अलग रखा, लेकिन उनकी माफी को पर्याप्त मानकर मामला रफा-दफा नहीं करना चाहिए।


बल्कि तृणमूल कांग्रेस उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर एक नई शुरुआत कर सकती है। सच तो यह है कि लोकसभा सदस्य होने के नाते तपस पाल के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का भी मामला बन सकता है। क्या हम इस राजनीतिक पुनर्जागरण के लिए तैयार हैं?

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