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क्षेत्रीय शांति के लिए

Tue, 27 May 2014 08:07 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Tue, 27 May 2014 08:07 PM IST
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for regional stability

अपने चुनाव अभियान के दौरान विकास और सुशासन पर जोर देने वाले नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में शुरुआत पड़ोसी देशों से कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने की पहल के साथ की है। दक्षेस देशों के नेताओं के साथ हुई उनकी इन संक्षिप्त मुलाकातों से बहुत निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते, मगर ठप पड़े भारत-पाकिस्तान संबंधों और अफ-पाक क्षेत्र में इस वर्ष नाटो और अमेरिकी फौजों की वापसी को देखते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई के साथ हुई उनकी मुलाकातों को अहम माना जा सकता है।

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भारत और पाकिस्तान के बीच मुलाकात के इस सिलसिले को आगे बढ़ाने पर सहमति बनी है, मगर यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी जानते हैं कि दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंध कितने नाजुक हैं। जनवरी, 2004 में इस्लामाबाद में दक्षेस सम्मेलन के दौरान पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल मुशर्रफ ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ जारी संयुक्त बयान में भरोसा दिया था कि वह अपने देश से भारत के खिलाफ किसी भी तरह की आतंकी गतिविधियों को अंजाम होने नहीं देंगे। लेकिन एक दशक के बीत जाने के बावजूद इस स्थिति में बदलाव नहीं आया है।
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भारत पाकिस्तान से अभी दो चीजें चाहता है- 26/11 के मुंबई हमले के साजिशकर्ता हाफिद सईद सहित अन्य आतंकियों के खिलाफ जल्द से जल्द कार्रवाई और व्यापारिक बाधा दूर करने के लिए प्राथमिकता वाले देश का दर्जा। भारत के लिए संतोष की बात यह है कि पाकिस्तान में न केवल लोकतांत्रिक सरकार है, बल्कि वहां के प्रधानमंत्री ने सकारात्मक रुख दिखाते हुए अविश्वास को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने का भरोसा जताया है।
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खुद शरीफ की स्थिति का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उनके भारत आने का उनके मुल्क में ही काफी विरोध हो रहा था। यहां तक कि करजई ने हेरात में भारतीय वाणिज्य दूतावास पर हुए आतंकी हमले में लश्कर ए तैयबा पर आरोप लगाया है! जाहिर है, अफ-पाक क्षेत्र में ऐसी ताकतें आने वाले समय में और सक्रिय हो सकती हैं। इसलिए मोदी और शरीफ की मुलाकात से उत्साहित होने के साथ ही यह समझने की भी जरूरत है कि द्विपक्षीय संबंध भावनाओं से नहीं, राजनय से चलते हैं।

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