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क्षेत्रीय स्थिरता के लिए
नई दिल्ली
Updated Fri, 27 Jun 2014 08:48 PM IST
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने शपथ ग्रहण में दक्षेस देशों के नेताओं को आमंत्रित कर पहले ही संकेत दे चुके हैं कि पड़ोसी देशों से रिश्ते मजबूत करना उनकी विदेश नीति का अहम हिस्सा होगा। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए बांग्लादेश को चुनकर इसी सिलसिले को आगे बढ़ाया है। स्वराज की यह यात्रा इसलिए भी खास है, क्योंकि दोनों देशों के रिश्ते बीते एक दशक के दौरान बेहतर हुए हैं।
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दरअसल बांग्लादेश से भारत के खिलाफ अभियान चलाने वाले उल्फा और अन्य अलगाववादी गुटों को नष्ट करने में इस पड़ोसी देश की अहम भूमिका रही। इसके अलावा यूपीए सरकार के दौरान सितंबर, 2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीना के बीच भूमि सीमा समझौते (एलबीए) पर हस्ताक्षर हुए थे। लेकिन वायदे के बावजूद भारत इस समझौते की पुष्टि संसद से नहीं करवा सका है। इसी तरह बांग्लादेश के साथ तीस्ता जल बंटवारे की संधि भी लटकी हुई है। इन्हीं दोनों मुद्दों के कारण स्वराज की बांग्लादेश यात्रा अहम मानी जा रही थी, क्योंकि इन पर भाजपा का रुख यूपीए सरकार से भिन्न रहा है।
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वास्तव में तीस्ता जल बंटवारे और एलबीए के मुद्दे लटके ही इसलिए, क्योंकि तृणमूल कांग्रेस और असम गण परिषद के साथ ही भाजपा भी इनका विरोध कर रही थी। स्वराज की यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच किसी समझौते पर तो हस्ताक्षर नहीं किए गए, मगर उन्होंने बांग्लादेशी नेताओं के साथ बातचीत में इन मुद्दों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने का आश्वासन दिया है। वास्तव में दोनों देशों की चार हजार किमी से भी लंबी सीमा से जुड़ा एलबीए का मसला काफी जटिल है, पर इसे और लटकाए रखना दोनों ओर की बस्तियों में बेहद जटिल परिस्थितियों में रह रहे दोनों देशों के नागरिकों के साथ अन्याय होगा।
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निश्चय ही द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूत करने की अपार संभावनाएं हैं, जिससे दोनों ही पक्षों को लाभ हो सकता है। मगर इसके लिए संदेहों को दूर करने और खुले मन से आगे बढ़ने की जरूरत है। एनडीए सरकार के साथ अच्छी बात यह है कि उसे जिस तरह का बहुमत मिला है, उसमें उस पर किसी तरह का क्षेत्रीय दबाव भी नहीं है।