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निर्भय न्यायपालिका

अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 06 Apr 2015 08:23 PM IST
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Fearless judiciary

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न्यायपालिका को नसीहत दी है कि वह कथित फाइव स्टार एक्टिविस्ट्स के भय से धारणा के आधार पर फैसले न करे। उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों और मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में हालांकि प्रधान न्यायाधीश एच एल दत्तू ने इस आशंका को तुरंत ही खारिज कर दिया, लेकिन इस प्रसंग ने सरकार की मंशा और न्यायपालिका से उसके रिश्ते को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
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इसमें दो राय नहीं है कि न्यायपालिका के भीतर भी गड़बड़ियां हो सकती हैं, कुछ न्यायाधीशों के कदाचार से संबंधित मामले सामने आए ही हैं। इसके बावजूद हमारे यहां न्यायपालिका को उच्च दर्जा प्राप्त है और उसके फैसलों पर अमूमन कोई सवाल उठाने की हिमाकत भी नहीं करता। ऐसे में उसकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। मगर इसके साथ ही यह भी सच है कि कई मामलों में न्यायाधीशों को कानूनी किताबों से इतर मानवीय आधार पर भी फैसले करने होते हैं। दरअसल सरकारों को मुश्किल तब पेश आती है, जब न्यायपालिका उनके फैसलों को पलट देती है या फिर उन्हें किसी तरह के निर्देश देती है।


वास्तव में दो-ढाई दशकों में जब से नई आर्थिक नीतियां आई हैं और विकास का नया मॉडल आया है, उसने सामाजिक कार्यकर्ताओं और आंदोलनकारियों की नई जमात भी पैदा की है, जिनसे सरकारों का टकराव होता रहता है। कई बार यह टकराव न्यायपालिका तक पहुंच जाता है, मगर इसका यह मतलब नहीं है कि न्यायपालिका इन कार्यकर्ताओं के दबाव में आ जाती है।

हालांकि इस सम्मेलन का यह एक छोटा हिस्सा ही था, असली मुद्दा न्यायपालिका के बढ़ते बोझ और आम लोगों को कानूनी राहत देने पर केंद्रित था। न्यायमूर्ति दत्तू ने निचली अदालतों में फैसलों के निपटारे के लिए पांच वर्ष की समयसीमा की बात की है, लेकिन तीन करोड़ से अधिक लंबित मामलों को देखते हुए समझा जा सकता है कि बोझ कितना बड़ा है। वहीं प्रधानमंत्री ने 1,700 से अधिक बेकार पड़े कानूनों को खत्म करने की बात की है।

वास्तव में हमारे संविधान निर्माताओं ने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के रिश्तों को अच्छी तरह से परिभाषित किया है और तीनों के बीच बेहतर तालमेल ही हमारे लोकतंत्र की खूबसूरती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस मंथन से यह रिश्ता और प्रगाढ़ होगा।

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