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जानलेवा शराब

Tue, 13 Jan 2015 07:25 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Tue, 13 Jan 2015 07:25 PM IST
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Fatal alcohol

उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ और उन्नाव जिले में जहरीली शराब से हुई मौतें बताती हैं कि महज तीन महीने पहले आजमगढ़ में जहरीली शराब से 35 से अधिक लोगों की मौतों के बाद की गई फौरी कार्रवाई के बाद कुछ भी नहीं बदला। बीते दो दिनों के दौरान प्रदेश सरकार ने एक बार फिर मुस्तैद होते हुए आबकारी और पुलिस विभाग के अनेक अधिकारियों और कर्मचारियों को निलंबित कर दिया है, लेकिन जब तक अवैध शराब के कारोबार को जड़ से खत्म नहीं किया जाता, ऐसी सारी कार्रवाइयां बेमानी ही साबित होंगी।

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वास्तव में सूबे में कच्ची शराब का कारोबार बड़ा फैला हुआ है, जिसने ग्रामीण बस्तियों में कुटीर उद्योग का रूप ले लिया है। सरकारी दर से बिकने वाली देसी शराब से एक तिहाई दरों पर बिकने वाली इस अवैध शराब का कारोबार बिना आबकारी और पुलिस विभाग की मिलीभगत के चल ही नहीं सकता! हैरत की बात है कि मौत का सामान बनाती कच्ची शराब की इन भट्टियों की ओर प्रशासन का ध्यान तभी जाता है, जब मलीहाबाद जैसा कोई हादसा होता है! ऐसे हर हादसे का शिकार गरीब और श्रमिक तबका होता है। इसी हादसे ने न जाने कितने घरों को उजाड़ दिया है।
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सवाल सिर्फ इस एक हादसे का नहीं है। मलिहाबाद और उन्नाव में हुई मौतों के बाद यह बात सामने आई है कि इस कच्ची शराब का नशा बढ़ाने के लिए नींद की गोलियां, यूरिया और अन्य तरह के रसायन मिलाए जाते हैं। इस बात का हालांकि कोई प्रामाणिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन इससे कौन इन्कार कर सकता है कि इस शराब ने न जाने कितने लोगों को गंभीर बीमारियों का शिकार न बनाया हो! आखिर इसी हादसे में बीमार हुए सवा सौ से अधिक लोग अब भी अस्पतालों में हैं, जिनमें से कई की हालत गंभीर है।
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निश्चिय ही नशा एक सामाजिक बुराई है, लेकिन सिर्फ सामाजिक जागरूकता के जरिये इस पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता। इसके लिए कानूनी कड़ाई भी जरूरी है, साथ ही आबकारी नीति में भी व्यापक बदलाव किए जाने की जरूरत है। यह सिर्फ एक राज्य का मामला भी नहीं है, क्योंकि अवैध शराब के कारोबारी तस्करी के जरिये भी दूसरे राज्यों तक अपना जाल फैलाए हुए हैं। जाहिर है, अवैध शराब के खिलाफ एक मजबूत तंत्र विकसित करने की जरूरत है, ताकि ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति न हो।

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