सरकारी बंगले का मोह

नई दिल्ली Updated Thu, 08 May 2014 07:55 PM IST
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Fascination of government quarter

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सत्ता का आकर्षण और उसका रुतबा कैसा होता है, यह हमारे माननीय मंत्रियों और सांसदों से बेहतर भला कौन जा सकता है, जिनसे राजधानी के लुटियन जोन में स्थित सरकारी बंगलों का मोह नहीं छूटता। एक आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा जुटाई गई जानकारी से पता चला है कि 22 पूर्व केंद्रीय मंत्री पद से हटने के महीनों बाद भी विशालकाय सरकारी बंगलों पर कब्जा जमाए बैठे हैं। यह सब तब, जब सर्वोच्च अदालत ने साफ तौर पर कहा है कि मंत्रियों और सांसदों को पद से हटने के एक महीने के भीतर ही इन बंगलों को खाली कर देना चाहिए।
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हद तो यह है कि भ्रष्टाचार के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद लोकसभा की सदस्यता गंवाने वाले लालू प्रसाद यादव ने भी नियमों को ताक पर रखकर अब तक उन्हें आवंटित हुआ बंगला खाली नहीं किया है। यही हाल बूटा सिंह का है, जिन्हें बाजार से काफी कम दर से किराया भुगतान करने की छूट दी गई है! जाहिर है, यह सब केंद्रीय आवास मंत्रालय और दोनों सदनों की आवास समिति की सहमति के बिना नहीं हो सकता, जिन पर सांसदों और मंत्रियों को बंगले आवंटित करने की जिम्मेदारी होती है।
फिर यह नहीं भूलना चाहिए कि यह प्रवृत्ति सिर्फ राजनीतिकों तक सीमित नहीं है, बड़े नौकरशाह भी इस मामले में पीछे नहीं हैं। यही नहीं, सांसदों को आवंटित बंगलों में व्यावसायिक गतिविधियां चलाने के साथ ही ट्रस्ट वगैरह तक बना दिए गए हैं।
असल में मुश्किल यह है कि हमारे जनप्रतिनिधि सांसद या मंत्री होने के नाते मिलने वाली सुविधाओं को अपना अधिकार समझने लगते हैं और उनमें अपनी इस स्थिति के दुरुपयोग की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। इसी का नतीजा है कि आज भी सांसदों के लिए आरक्षित पचास से अधिक आवासों में उनके रिश्तेदार और मित्र जमे हुए हैं; तो अनेक सांसदों ने अपनी पत्नी या पति और संबंधियों को अपना निजी सहायक बनाने से भी गुरेज नहीं किया है।

देश में चल रहे चुनावी शोर-शराबे में भ्रष्टाचार पर तो काफी बातें सुनने को मिली हैं, मगर राजनीतिक सुधारों को लेकर कुछ भी सुनने को नहीं मिला। पखवाड़े भर बाद नई लोकसभा का गठन हो जाएगा, क्या उम्मीद करें कि उसके बाद इस दिशा में कुछ पहल होगी? हमारे माननीयों को मिलने वाली सुविधाओं पर आखिर विचार क्यों नहीं होना चाहिए।
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