{"_id":"d7a5e1dc1ef1346a3ee881dbcd884fa1","slug":"farmer-s-problem-hindi","type":"story","status":"publish","title_hn":"किसानों पर आफत","category":{"title":"Other Archives","title_hn":"अन्य आर्काइव","slug":"other-archives"}}
किसानों पर आफत
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Mon, 16 Mar 2015 07:14 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बेमौसम बरसात और ओलावृष्टि ने किसानों की रीढ़ तोड़ दी है। यह बारिश उनके लिए दोहरी मार बनकर आई है। मानसून के मौसम में अपेक्षाकृत कम बारिश होने से कई क्षेत्रों में धान की फसल को पहले ही नुकसान हो चुका है। और अब मार्च के महीने में हुई बारिश और ओलावृष्टि ने गेहूं, कपास, ज्वार, सरसों, आलू और मटर की खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचाया है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के कई गांवों में 80 फीसदी से भी अधिक फसल के बर्बाद होने की खबर है।
विज्ञापन
नतीजतन उन क्षेत्रों से भी किसानों की सदमे से मौत या खुदकुशी की खबरें सुनने को मिली हैं, जहां अमूमन विदर्भ या छत्तीसगढ़ जैसे हालात नहीं होते। यह स्थिति किसानों की बदहाली की तस्वीर ही प्रदर्शित करती है। मौसम की इस मार से हुए नुकसान के आकलन के बाद ही सही स्थिति पता चलेगी, पर मार्च के पहले हफ्ते में हुई बारिश के बाद ही अनुमान जताया गया था कि इससे 50 लाख हेक्टेयर की फसलों को नुकसान पहुंचा है।
विज्ञापन
मौसम विभाग का अनुमान है कि अगले कुछ दिनों तक बारिश और ओलावृष्टि और हो सकती है, लिहाजा नुकसान और बढ़ेगा ही। महाराष्ट्र सहित कई राज्यों ने सैकड़ों गांवों को सूखा प्रभावित घोषित किया था और अब उन्हीं इलाकों में बारिश और ओलावृष्टि ने फसल को नुकसान पहुंचाया है। यह स्थिति देश के अन्नदाता कहे जाने वाले किसानों की मौसम के आगे बेबसी को भी प्रदर्शित करती है। उत्तर प्रदेश सरकार ने किसानों के लिए 200 करोड़ रुपये की राहत की घोषणा की है, लेकिन नुकसान को देखते हुए यह कम ही लगता है।
विज्ञापन
असल में प्राकृतिक कारणों से फसलों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए पुख्ता इंतजाम किए जाने की जरूरत है। फसल बीमा की व्यवस्था है, लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि देश में सीमांत या छोटे किसानों का बड़ा वर्ग है, जो बैंकों वगरैह से कहीं अधिक स्थानीय सूदखोरों के कर्ज पर निर्भर होता है, लिहाजा सरकारी बैंकों से यदि कर्ज वसूली पर रोक लग भी जाए, तब भी उनकी मुश्किलें कम नहीं होतीं। एनडीए सरकार को लागत से पचास फीसदी अधिक समर्थन मूल्य तय करने के अपने वायदे को पूरा करने का यही वक्त है, ताकि किसानों को कुछ तो राहत मिले।