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दूरगामी फैसला
नई दिल्ली
Updated Mon, 31 Mar 2014 07:46 PM IST
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सर्वोच्च अदालत के दिल्ली में 1993 में हुए बम धमाके के दोषी खालिस्तानी लिबरेशन फोर्स के आतंकी देवेंद्र सिंह भुल्लर की मौत की सजा को कम कर उम्र कैद में बदलने के फैसले को स्वाभाविक रूप से चुनाव से जोड़कर देखा जाएगा। मगर इसे हमारे पूरी न्यायिक व्यवस्था में आ रहे एक बड़े बदलाव के रूप में देखने की भी जरूरत है।
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दरअसल इस फैसले को सर्वोच्च अदालत के पिछले दो महीने के दौरान आए कुछ फैसलों के विस्तार के रूप में देखना चाहिए। सर्वोच्च अदालत ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के तीन हत्यारों सहित कुछ अन्य मामलों में दोषी ठहराए गए 15 से अधिक लोगों की सजा उनकी दया याचिकाओं के निपटारे में हुए अनावश्यक विलंब के कारण कम की है। देवेंद्र सिंह भुल्लर की सजा कम करने के पीछे भी दया याचिका के निपटारे में हुए आठ वर्ष के विलंब के साथ ही उसकी मानसिक बीमारी को भी अदालत ने एक वजह बताई है।
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बेशक, भारत दुनिया के उन चुनींदा देशों में है, जहां दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों में ही मृत्युदंड का प्रावधान है। मगर, पिछले कुछ वर्षों में सरकारों द्वारा मृत्युदंड प्राप्त दोषियों की दया याचिकाओं को लटकाए रखने की प्रवृत्ति देखी गई है। इसके पीछे निश्चय ही राजनीतिक कारण रहे हैं। मगर सर्वोच्च अदालत ने मृत्युदंड और दया याचिका के मामलों में दिशा निर्देश जारी कर न्यायिक व्यवस्था के प्रति विश्वास बढ़ाया है।
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हाल ही में देश के प्रधान न्यायाधीश पी सदाशिवम ने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देकर बरसों से अपनी दया याचिका के निपटारे का इंतजार कर रहे दोषियों के जीने के मानवीय अधिकार का मुद्दा उठाया था। इसमें कोई दो मत नहीं कि देवेंद्र सिंह भुल्लर या राजीव गांधी के हत्यारों ने जो काम किया, उसकी किसी भी सभ्य समाज में कोई जगह नहीं है। भुल्लर की ही बात करें, तो उसे युवा कांग्रेस के कार्यालय के बाहर बम धमाका करने का दोषी पाया गया, जिसमें नौ लोग मारे गए थे और तत्कालीन युवा कांग्रेस अध्यक्ष एम एस बिट्टा सहित अनेक लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।
जाहिर है, आतंकी गतिविधियों को रोकने के लिए जरूरी है कि आतंकी मंसूबा रखने वालों के मन में कानून का खौफ पैदा हो; मगर कानून की आड़ में कोई भी व्यवस्था अमानवीय नहीं हो सकती। सर्वोच्च अदालत के फैसले का यही निहितार्थ है।