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भाजपा में पुत्रोदय!

Mon, 25 Feb 2013 10:08 AM IST
Updated Mon, 25 Feb 2013 10:08 AM IST
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familism in bjp

उत्तर प्रदेश भाजपा की नई टीम में नेता पुत्रों को देखकर वे लोग स्वाभाविक ही चकित होंगे, जो कैडर आधारित पार्टी होने के कारण इस दल को वंश और परिवार की तमाम दुष्प्रवृत्तियों से अछूते मानते रहे हैं। नई प्रदेश कमेटी में राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह, लालजी टंडन और प्रेमलता कटियार के बेटे-बेटियों का होना सुबूत है कि भले देर से ही हो, पर भाजपा ने भी राजनीति में अपने बेटे-बेटियों को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति अपना ली है।

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भाजपा को इसका नुकसान यह होगा कि अब वह दूसरी राजनीतिक पार्टियों के परिवारवाद पर आवाज नहीं उठा सकेगी। लेकिन उसे अगर इसकी चिंता ही होती, तो वह ऐसा कदम उठाती ही क्यों! प्रांतीय स्तर पर उठाए गए कदम के बावजूद इसके निहितार्थ न सिर्फ बेहद गंभीर हैं, बल्कि इससे पता चलता है कि समकालीन राजनीति नैतिक आग्रहों से उतनी चालित नहीं होती, जितनी कि बुराइयों से दुष्प्रभावित होती है।
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कांग्रेस का ही उदाहरण लें, तो कहा यह जाता है कि देश की यह सबसे पुरानी पार्टी नेहरू-गांधी परिवार के बिना जिंदा ही नहीं रह सकती, पर उसके यूथ ब्रिगेड में दूसरी पीढ़ी के लोगों का जैसा वर्चस्व है, वह भी उतना ही स्तब्ध करने वाला है। तथ्य यह है कि कांग्रेस के युवा नेताओं में से ज्यादातर को राजनीति विरासत में मिली है।
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क्षेत्रीय पार्टियां चूंकि नैतिक आदर्शों का वैसा दावा भी नहीं करतीं, इसलिए उत्तर से दक्षिण भारत तक उनके यहां परिवारवाद का खुला खेल है। यही कारण है कि द्रविड़ राजनीति के पुरोधा को उत्तराधिकारी के रूप में अपनी ही संतानें दिखाई देती हैं, तो उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी सपा में परिवारवाद पुत्र तक सीमित न रहकर उससे आगे विस्तार पा चुका है।


कैडर आधारित वाम पार्टियों में यह दुष्प्रवृत्ति बेशक नहीं है, पर जो खुद अस्तित्व के लिए जूझ रही हों, वे राजनीति को भला क्या दिशा दे पाएंगी! भारत जैसे लोकतंत्र में राजनीति के परिवार तक सीमित हो जाने से न सिर्फ देशसेवा की महत्वाकांक्षा पाले आदमी का संसद और विधानसभाओं में प्रवेश मुश्किल हो जाएगा, बल्कि वैसी स्थिति में हम भविष्य में किन्हीं राममनोहर लोहिया, चौधरी चरण सिंह, चंद्रशेखर या अटल बिहारी वाजपेयी के होने की संभावना को भी खत्म कर रहे होंगे। 

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