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आस्था से जुड़ी यात्रा

Fri, 02 May 2014 08:29 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Fri, 02 May 2014 08:29 PM IST
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Faith-related travel

चार धाम यात्रा के प्रति जो उत्साह पिछले साल तक भी था, वह इस बार कम दिखता है, तो इसके लिए सिर्फ उस त्रासदी को कोसने से काम नहीं चलेगा। पिछले वर्ष जून में केदारनाथ सहित चार धाम यात्रा को प्रकृति के भीषण कहर का सामना करना पड़ा था, जिसका असर आगामी अनेक वर्षों तक बना रहने वाला है।

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लेकिन वैसी त्रासदी के लिए हमारे तौर-तरीके ही जिम्मेदार हैं, जिसके तहत चार धाम की बेहद पवित्र मानी जाने वाली तीर्थयात्रा को सैर-सपाटे का रूप दे दिया गया। संवेदनशील भूस्खलन वाले इलाके में विशाल होटल बना देने और बड़ी-बड़ी गाड़ियों की अबाध आवाजाही जारी रहने का यह नतीजा होना ही था।
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पर उतनी ही बड़ी विडंबना यह है कि जो यात्रा उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान करती है, उसे पटरी पर लाने की इन ग्यारह महीनों में प्रभावी कोशिश नहीं हुई। इसका जो राजनीतिक नुकसान होना है, वह तो है ही, पर तीर्थयात्रियों से लेकर स्थानीय लोगों को होने वाला घाटा उससे कहीं अधिक है। अब गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट खुल तो गए हैं, पर भीषण बारिश और भूस्खलन से बदहाल गंगोत्री हाई-वे अभी तक दुरुस्त नहीं है।
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यमुनोत्री धाम के रास्ते में बड़कोट से फुलचट्टी तक कहीं शौचालय नहीं है, तो कई जगह हैंडपंप बंद पड़े हैं। इसी तरह लामबगड़ से बदरीनाथ तक जो सड़क बनी है, वह शायद बरसात में जवाब दे जाए! केदरानाथ धाम तक पहुंचना तो अब भी बहुत कठिन बताया जा रहा है। अब तक यात्रा शुरू होने के पखवाड़े भर पहले से ही जहां होटलों में भारी भीड़ हो जाती थी, वहीं छोटे-छोटे कारोबारी की गृहस्थी की गाड़ी इसी छह महीने की कमाई से साल भर चलती थी। वाहन संचालकों से लेकर, ढाबे वाले, पालकी वाले और शारीरिक श्रम करने वाले कुली तक इसी अवसर का बेसब्री से इंतजार करते थे।


पर प्राकृतिक दुर्योग और फिर पुनर्निर्माण के मोर्चे पर सरकार की निष्क्रियता से स्थिति बिल्कुल बदल गई है। चार धाम यात्रा हमारी आस्था से जुड़ी यात्रा है, जिसे पवित्र भी होना चाहिए और सुरक्षित भी। जो स्थानीय लोग देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं की इस यात्रा में सहभागी बनते हैं, उनके हितों की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है। अब भी देर नहीं हुई है। धीरे-धीरे ही सही, चार धाम यात्रा को पटरी पर लाने की कोशिश होनी चाहिए।

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