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उम्मीदें और चुनौतियां

Fri, 15 Aug 2014 11:49 AM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Fri, 15 Aug 2014 11:49 AM IST
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Expectations and Challenges

हर वर्ष की तरह यह तारीख एहसास कराती और याद दिलाती है कि हमें कितने संघर्षों और कितनी कुर्बानियों के बाद आजादी हासिल हुई थी। दुश्वारियों और चुनौतियों के बीच यह वाकई बड़ी उपलब्धि है कि हम आज देश का 68वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं। वरना हम देख सकते हैं कि दुनिया के एक बड़े हिस्से में किस तरह से लोकतंत्र को लेकर संघर्ष हो रहे हैं। यहां तक कि विभाजन की वजह से अस्तित्व में आए हमारे पड़ोसी पाकिस्तान की भी स्थिति यह है कि वहां स्वतंत्रता दिवस के दिन सड़कों पर प्रदर्शन हुए।

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विगत वर्षों में खासतौर से 21वीं सदी में कदम रखने के बाद से भारत ने दुनिया को अपनी क्षमता का एहसास कराया है, नतीजतन उसे एक बड़ी आर्थिक और सामरिक ताकत के तौर पर भी देखा जाने लगा है। हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव भी हमारे लोकतंत्र की मजबूती और परिपक्वता को ही दर्शाते हैं। मगर इसके बावजूद देश के सामने गरीबी आज सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। यह वाकई शर्मनाक है कि आजादी के सातवें दशक की ओर बढ़ते हुए भी हम तकरीबन एक तिहाई आबादी को सम्मानजनक तरीके से दो वक्त का भोजन तक उपलब्ध नहीं करा पाते।
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गांधी ने अंतिम व्यक्ति की बात की थी। यह अंतिम व्यक्ति देश के नीति नियंताओं, अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों की गरीबी की रेखा की परिभाषा में कहीं उलझ गया है। यही नहीं, पिछले एक वर्ष के दौरान उत्तर प्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों में हुई सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं ने भी हमारे बहुरंगी सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाया है। हैरानी की बात यह है कि संसद में इस मुद्दे पर हुई बहस भी कोई दिशा देती नहीं दिखती। वास्तव में इसे लेकर राजनीतिक दलों को अपना नजरिया बदलने की जरूरत है।
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महिलाओं की सुरक्षा भी ऐसा मुद्दा है, जो उनकी आजादी से जुड़ा हुआ है। दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की बहुचर्चित घटना के बाद अस्तित्व में आए कठोर कानून के बावजूद महिलाओं के खिलाफ अपराध कम नहीं हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव के दौरान अच्छे दिन लाने का वायदा किया था और सबको साथ लेकर चलने की बात की थी। उनके पास अपने इस वायदे को अमल में लाने का मौका है। संभव है कि आज जब वह लाल किले के प्राचीर से देश को संबोधित करेंगे, तो उसमें इसकी झलक मिलेगी।

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