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कांग्रेस की परीक्षा

Fri, 12 Sep 2014 08:53 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Fri, 12 Sep 2014 08:53 PM IST
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exam for congress

लोकसभा चुनाव में दो अंकों में सिमट गई कांग्रेस को अब एक और परीक्षा से गुजरना है। महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के साथ उसका गठबंधन डेढ़ दशक से सत्ता में काबिज है; वहीं हरियाणा में वह दस वर्षों से सत्ता में है। दूसरी ओर इन दोनों राज्यों के चुनावों को लेकर भाजपा का उत्साहित होना स्वाभाविक है।

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लोकसभा चुनाव के बाद से जारी तल्खी के बावजूद कांग्रेस और एनसीपी मजबूरी के चलते एक साथ हैं, पर कहना मुश्किल है कि यह गठबंधन विधानसभा चुनाव के बाद भी कायम रहे! वह फिर आदर्श सोसाइटी का मामला हो या किसानों की आत्महत्या का मुद्दा, कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन सरकार को बदनामी झेलनी पड़ी है। जाहिर है, उसके सामने अपने कार्यकर्ताओं को चुनाव के लिए तैयार करने के साथ ही सत्ता विरोधी माहौल से जूझने की भी चुनौती है।
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दूसरी ओर दो वर्ष पूर्व बाल ठाकरे की मौत और फिर मोदी सरकार के गठन के तुरंत बाद गोपीनाथ मुंडे की असमय मौत से शिवसेना-भाजपा गठबंधन को गहरा धक्का लगा। इसके बावजूद इस गठबंधन को लगता है कि महाराष्ट्र की सत्ता हासिल करने के लिए परिस्थितियां उसके अनुकूल हैं। वहां राज ठाकरे ने तीसरी ताकत के रूप में खुद को पेश जरूर किया है, पर उनका दायरा मुंबई और उसके आसपास तक सीमित है। वहां मुख्य मुकाबला दोनों पारंपरिक गठबंधनों के बीच ही है।
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वहीं हरियाणा में चार बड़ी ताकतें दिख रही हैं- सत्तारूढ़ कांग्रेस, भाजपा, इंडियन नेशनल लोकदल और हरियाणा जनहित कांग्रेस। वहां राबर्ट वाड्रा के जमीन संबंधी विवाद और आईएएस अधिकारी अशोक खेमका के उत्पीड़न जैसे मुद्दों की लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाने में अहम भूमिका थी।


इन दोनों राज्यों के विधानसभा चुनावों से पहले ही उत्तर प्रदेश की 11 सीटों सहित विभिन्न राज्यों की 33 विधानसभा सीटों और लोकसभा की तीन सीटों पर आज हो रहे उपचुनाव भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। यदि इनमें भाजपा की सीटें कम होती हैं, तो उसे नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता से जोड़कर देखा जाएगा और विपक्ष इसे महाराष्ट्र और हरियाणा में मुद्दा बनाने से गुरेज नहीं करेगा।

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