खत्म हुआ एक दौर

Ashok Kumar Updated Mon, 24 Dec 2012 12:01 PM IST
ending of sachin tendulkar era
एकदिवसीय क्रिकेट से सचिन तेंदुलकर की विदाई एक घटना है, तो सिर्फ इसलिए नहीं कि इसमें टीम इंडिया को विश्व शक्ति बनाने में उनका योगदान सर्वाधिक रहा है, बल्कि उनका जाना इसलिए भी ध्यान खींचता है कि एक पूरी पीढ़ी उनको खेलते देखकर जवान हुई है। कपिल देव के नेतृत्व में देश ने जब पहला विश्व कप जीता था, तब सचिन बेशक टीम का हिस्सा नहीं थे। लेकिन उसके करीब एक दशक बाद सीमित ओवर के क्रिकेट में भारत जब एक ताकत बना, तो उसमें सचिन की भूमिका सर्वोपरि थी।

उपलब्धियों से छूछे इस देश में सुनील गावस्कर अगर शास्त्रीय क्रिकेट के शिखर पुरुष थे, तो युवा शक्ति की संभावनाओं से भरे देश में सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट को एक विस्फोटक खेल में बदला, जिसमें रक्षात्मक खेल के बजाय सामने आकर ताबड़तोड़ बल्लेबाजी करना ज्यादा महत्वपूर्ण था। सचिन ने दिखाया कि ऐसे अवसरों पर कॉपीबुक बैटिंग के बजाय सही टाइमिंग और प्लेसमेंट के साथ खेला गया कोई भी शॉट कारगर है। उन्होंने कई ऐसे शॉट्स का ईजाद किया, जो अपने यहां पहले नहीं देखे गए थे।

शुरुआती पंद्रह ओवरों में धुआंधार बैटिंग का श्रेय भले ही सनथ जयसूर्या या मार्गरेट बैच को मिले, लेकिन सचिन और सौरव गांगुली ने अनेक एकदिवसीय मैचों में इसी तरह आक्रामक तरीके से खेलकर टीम को ठोस आधार दिया। कभी जो टीम पूरी पारी खेलकर बमुश्किल डेढ़-दो सौ रन बनाती थी, अब वही टीम साढ़े तीन सौ रनों का पीछा करने न सिर्फ उतरती थी, बल्कि डंके की चोट पर लक्ष्य हासिल करती थी। बेशक इन उपलब्धियों में कइयों का साझा होता था, लेकिन सचिन की पहल और प्रेरणा के बगैर यह शायद ही संभव होता।

उनकी उपलब्धियों का पहाड़ पार करते हुए किसी भी बल्लेबाज की सांस फूलने लगेगी। और बल्लेबाजी ही क्यों, हीरो कप फाइनल के आखिरी ओवर में गेंदबाजी करते हुए टीम को जीत दिलाना क्या कोई साधारण उपलब्धि थी! और उनचालीस की उम्र तक कभी उनकी गणना सुस्त फील्डरों में नहीं हुई। एकदिवसीय से विदाई के वक्त सचिन का शुक्रिया इसलिए भी अदा करना चाहिए कि उन्होंने इस 'जेंटलमैन गेम' को कभी विवाद का हिस्सा नहीं बनाया।

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