फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Other Archives ›   end of hope

एक उम्मीद का खत्म होना

Mon, 24 Sep 2012 02:55 PM IST
Updated Mon, 24 Sep 2012 02:55 PM IST
विज्ञापन
end of hope

तकरीबन दो साल पहले गांधीवादी अन्ना हजारे की अगुआई में शुरू हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन की जो परिणति हुई है, उससे उन करोड़ों बेबस लोगों को धक्का जरूर लगा होगा, जो इसे एक उम्मीद की तरह देख रहे थे। ये वे लोग हैं, जिन्हें रोजमर्रा की जिंदगी में राशन दुकानों से कोटे का सामान लेने से लेकर लाइसेंस बनवाने और जमीन की रजिस्ट्री करवाने से लेकर इलाज करवाने तक रिश्वत देनी पड़ती है।

विज्ञापन


ये व्यवस्था के मारे वे लोग हैं, जिनका भरोसा देश के राजनीतिक वर्ग से टूट चुका है। दरअसल ऐसे समय जब रोजाना नए-नए घोटाले सामने आ रहे हों और भ्रष्टाचार के आरोपों से शीर्ष स्तर तक अछूता न हो, तब आम लोगों को अन्ना के आंदोलन में एक रोशनी नजर आई थी। इसीलिए जंतर-मंतर से लेकर रामलीला मैदान तक लोग जुटते चले गए। इस मिल रहे समर्थन के पीछे अन्ना हजारे की स्वच्छ और निर्विवाद छवि भी रही है, बावजूद इसके कि वह कोई बड़े प्रवर्तक या राजनीतिक चिंतक नहीं हैं।
विज्ञापन


असल में लोगों को उनमें एक ऐसा ईमानदार आदमी नजर आया, जो उनकी अपनी भाषा में उनकी तरह बात करता है। मगर, जिस तरह से अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल की राहें अलग हुईं हैं, उसने इस आंदोलन के अंतर्विरोधों और उसकी सीमाओं को ही उजागर किया है। हालांकि शुरुआत से ही ऐसे कई मौके आए, जब यह लगता था कि कहीं यह आंदोलन अपने उद्देश्य से भटक तो नहीं रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन


यह जनांदोलन देश भर में बड़े बांधों, परमाणु बिजली घरों, जमीन अधिग्रहण और विस्थापन आदि को लेकर चल रहे तमाम छोटे-छोटे आंदोलनों से इसलिए भी अलग था, क्योंकि इसने सीधे राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती दी थी। और अब अरविंद केजरीवाल जिस राजनीतिक विकल्प की बात कर रहे हैं, क्या वह जनता की आकांक्षाओं पर खरा उतर पाएगा और क्या वह खुद चुनावी राजनीति में उतरने के बाद अपनी प्रतिबद्धताओं से जुड़े रह पाएंगे?


जैसा कि खुद अन्ना ने भी कहा है, इसकी क्या गारंटी है कि जिन्हें अच्छा मानकर चुन लिया जाए, वे चुने जाने के बाद ईमानदार बने रहेंगे? ऐसे वक्त में जबकि नीतियों का विरोध करने के नाटक और साथ-साथ सत्ता में हिस्सा लूटने को तत्पर राजनीतिक दलों ने तमाशा खड़ा कर रखा है, इस आंदोलन की यह परिणति अप्रत्याशित नहीं है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed