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मुठभेड़ या हत्या
नई दिल्ली
Updated Wed, 08 Apr 2015 08:08 PM IST
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आंध्र प्रदेश में चित्तूर जिले में पुलिस मुठभेड़ में एक साथ बीस कथित चंदन तस्करों की मौत बेहद चौंकाने वाली होने के साथ कई सवाल भी खड़े करती है, जिनके जवाब जांच से ही मिल सकेंगे। इस घटना के जो ब्योरे सामने आए हैं, उनसे पता चलता है कि मारे गए लोग आदिवासी थे और चंदन की कथित तस्करी में उनकी हिस्सेदारी श्रमिकों जैसी ही थी।
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हालांकि घने जंगल के भीतर आदिम हथियारों से लैस लोगों की मौजूदगी का जिस तरह बचाव नहीं किया जा सकता, उसी तरह स्थानीय पहचान की हिंसक राजनीति के लिए कुख्यात दक्षिण में इस मुठभेड़ पर तमिलनाडु के गुस्से के पीछे लोकप्रियतावादी राजनीति की आशंका से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद एसटीएफ की यह कार्रवाई सवालों के घेरे में है। बेशक चंदन का पेड़ काटने वालों ने पुलिस बल पर हमला किया होगा; इससे पहले वे एक से अधिक बार वनरक्षकों की जान भी ले चुके हैं।
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पर अगर पुलिस वालों ने वाकई आत्मरक्षा में गोलियां चलाई होतीं, तो वे मारे गए लकड़हारों के पैरों को निशाना बनातीं, उनके चेहरों और सिर के पिछले हिस्सों पर अपनी बर्बरता की छाप न छोड़तीं। और फिर यदि इस अपराध में उनकी संलिप्तता थी, तो उनके जुर्म का फैसला अदालत को करने दिया जाता। बताया तो यह भी जा रहा है कि घटनास्थल के आसपास चंदन के पेड़ होने के बजाय झाड़ियां थीं, और लाशों के पास सुबूत के रूप में पाए गए चंदन की पेड़ के तने पुराने थे।
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यह पहले भी साफ हो चुका है कि चंदन तस्करों की ताकतवर लॉबी मोटा लालच देकर पेड़ काटने में माहिर आदिवासियों को जंगलों में भेजती है, जो अक्सर पुलिस का आसान निशाना बनते हैं। पूरे मामले की व्यापक जांच केवल गरीब आदिवासियों को न्याय दिलाने के लिए ही नहीं, बल्कि चंदन तस्करी के उस पूरे तंत्र को बेनकाब करने के लिए भी जरूरी है, जिसमें न सिर्फ राजनेताओं की लिप्तता है, बल्कि जिससे पुलिस वाले भी जुड़े हैं।
चूंकि चंद्रबाबू नायडू का पिछला मुख्यमंत्री काल भी मानवाधिकार की धज्जियां उड़ाने वाली 'मुठभेड़ों' के लिए चर्चा में रहा था, इसलिए इसकी भी जांच होनी चाहिए कि राजस्व का टोटा होने के कारण चंदन की नीलामी पर बुरी तरह निर्भर राज्य सरकार ने क्या इसकी तस्करी रोकने के लिए पुलिस को निरंकुश अधिकार दिए हैं।