निवेश व रोजगार पर जोर
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करीब डेढ़ महीने पहले सत्ता में आई नरेंद्र मोदी सरकार के सामने अर्थव्यवस्था को गति देने के साथ लोगों की अपेक्षाएं पूरी करने की जो चुनौती थी, वित्त मंत्री अरुण जेटली ने उन पर खरा उतरने की पूरी कोशिश की है। जिस सरकार को पांच फीसदी से कम की आर्थिक विकास दर, चार प्रतिशत से अधिक वित्तीय घाटा और राजस्व का भारी बोझ विरासत में मिला है, उसके लिए एक भरोसा जगाता बजट पेश करना आसान नहीं था। फिर भी इस बजट में किसानों के लिए राहत की घोषणाएं हैं, तो नौकरीपेशा करदाताओं को एकाधिक छूट देकर बचत को प्रोत्साहित करने का संदेश भी दिया गया है।
सड़कों, नए स्मार्ट शहरों और हवाई अड्डों के निर्माण की घोषणा के जरिये निवेश पर जोर दिया गया है, तो रोजगार सृजन पर भी ध्यान है। लघु उद्योग समिति के गठन का प्रस्ताव, नया उद्यम शुरू करने के लिए दस हजार करोड़ रुपये का फंड और पच्चीस करोड़ के निवेश पर पंद्रह फीसदी निवेश भत्ता रोजगार को गति देंगे। सामाजिक क्षेत्र में कम आवंटन के बावजूद महिलाओं की सुरक्षा, बेटियों को बचाने की प्रतिबद्धता और वरिष्ठ नागरिकों की सुविधाएं बढ़ाने की दिशा में कुछ कदम हैं, तो सौर ऊर्जा, नदी जोड़ परियोजना, नई थर्मल टेक्नोलॉजी और जलवायु परिवर्तन से निपटने की योजना भावी चुनौतियों से मुकाबला करने की तैयारियों का पता देती है।
उत्तर प्रदेश की बात करें, तो इसमें लखनऊ की मेट्रो परियोजना और पूर्वांचल में एक एम्स स्थापित करने की घोषणा है, तो वाराणसी के बुनकरों की भी चिंता है। रक्षा और बीमा क्षेत्र में सीधे विदेशी निवेश बढ़ाने के अलावा बजट में कोई बड़ा आर्थिक सुधार नहीं दिखता, पर इतनी जल्दी बड़े आर्थिक सुधारों की बहुत उम्मीद भी नहीं थी। बजट की सबसे बड़ी कमी यह है कि इसमें आर्थिक अनुशासन नदारद है।
पिछले वित्त मंत्री पी चिदंबरम खर्च में कटौती कर वित्तीय घाटे पर अंकुश लगाने की कोशिश कर रहे थे, ऐसे में, योजनागत खर्च सत्ताईस फीसदी बढ़ाकर वित्तीय घाटा कम करने का अरुण जेटली का दावा गले नहीं उतरता। इसी तरह आर्थिक सुस्ती और मानसून की कमी के बीच कर राजस्व में बढ़ोतरी का दावा भी बहुत विश्वसनीय नहीं है। बजट में आय के नए स्रोतों का कोई प्रभावी रोडमैप भी नहीं दिखता। सच तो यह है कि वित्तीय घाटे पर अगर अंकुश नहीं लगा, तो न महंगाई थमेगी, न नई सरकार की आर्थिक चुनौतियां कम होंगी।