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साहित्य का मायावी

Fri, 18 Apr 2014 08:20 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Fri, 18 Apr 2014 08:20 PM IST
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elusive of Literature

शब्दों के अपने मायावी संसार से अचंभित करने वाले गैब्रियल गार्सिया मार्खेज की मौत सिर्फ लातिनी अमेरिका के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे साहित्य जगत की एक बड़ी क्षति है। मगर यह सच है कि उन्होंने जिस अति यथार्थवाद की रचना की, उसके पीछे 20वीं सदी के लातिनी अमेरिका के हालात जिम्मेदार थे, जिनकी वजह से खुद मार्खेज को एक लंबा अरसा निर्वासन में बिताना पड़ा।

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नोबल पुरस्कार से सम्मानित इस उपन्यासकार की सर्वाधिक सराही और देश-विदेशों में पढ़ी गई कृति वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सालिट्यूडट यदि आज भी करोड़ों पाठकों को अपनी ओर खींचने का माद्दा रखती है, तो इसके पीछे सिर्फ भाषायी तिलिस्म ही नहीं है, बल्कि गरीबी और बदहाली में बिताए उनके जीवन के यथार्थ के अक्स भी हैं। वह फंतासी को यथार्थ पैदा करने का साधन भर मानते थे।
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वास्तव में उन्हें साहित्य की इस नई विधा-जादुई यथार्थवाद का जनक भी कहा जा सकता है। आज यह बात कल्पनातीत लग सकती है कि मार्खेज ने जब इस बहुचर्चित उपन्यास को अपनी तंगहाली में लिखना शुरू किया था, तो उन्हें अपने लेखन पर इतना भरोसा था कि वह मकान मालिक को इस बात के लिए राजी कर सके थे कि जब उनकी किताब छपकर आएगी, तो वह सारा कर्ज चुका देंगे!
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निश्चय ही मार्खेज 20वीं सदी के अकेले महान साहित्यकार नहीं थे, मगर वह अपने ढंगे के अकेले थे, यह दावे से कहा जा सकता है। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, मैंने कभी उन लेखकों की नकल नहीं की, जिनका मैं कायल हूं। अपने घोषित वामपंथी रुझान की वजह से उन्हें लंबे अरसे तक अमेरिका की नाराजगी भी झेलनी पड़ी, जिसके कारण उन्हें कई दशकों तक उस देश ने वीजा ही नहीं दिया। मगर उनकी कहानियों और उपन्यास ने उन्हें इतना बड़ा बना दिया कि अंततः तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को उन्हें आमंत्रित करना पड़ा था।


उन्होंने सिर्फ मानवीय सरोकारों पर ही नहीं लिखा, बल्कि अंतरंग मानवीय संबंधों को भी बारीकी से अपनी कृतियों में उकेरा। उनका रोमांटिक उपन्यास लव इन द टाइम ऑफ कालरा ऐसे ही विशाल फलक को समेटे हुए है। 87 वर्ष की उम्र में अपनी तिलिस्मी दुनिया को छोड़कर जाने वाले मार्खेज अपनी कृतियों के साथ पाठकों के बीच उपस्थित रहेंगे।

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