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चुनाव सुधार का अहम पड़ाव

Wed, 10 Jul 2013 09:37 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Wed, 10 Jul 2013 09:37 PM IST
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electoral reform

आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए गए सांसदों और विधायकों की सदस्यता समाप्त करने संबंधी फैसला सुनाकर सर्वोच्च न्यायालय ने वह काम किया है, जिसकी जिम्मेदारी वैसे तो संसद की थी। उसका यह फैसला राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है, जिससे उम्मीद बंधती है कि आपराधिक छवि वाले नेताओं को संसद और विधानसभाओं में जाने से रोका जा सकेगा।

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सर्वोच्च अदालत ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा चार के उन विवादास्पद प्रावधानों को 'अल्ट्रा वायरस' बताकर निरस्त कर दिया है, जिसकी वजह से आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए जाने के बावजूद दागी निर्वाचित प्रतिनिधि अपनी सदस्यता बचाए रखने में कामयाब हो जाते थे। यह प्रावधान संविधान की मूल भावना के ही खिलाफ था, जिसमें सभी को बराबरी का अधिकार दिया गया है। चुनाव सुधार की बातें तो बीते चार दशकों से हो रही हैं, पर अभी तक कोई कारगर कदम नहीं उठाया जा सका है। नतीजतन आज देश के कुल 4,835 सांसद-विधायकों में से 1,448 ऐसे निर्वाचित जन प्रतिनिधि भी हैं, जिन पर आपराधिक मामले दर्ज हैं।
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यही नहीं, मौजूदा संसद में 76 सांसद ऐसे हैं, जिनके खिलाफ गंभीर आरोप हैं और यदि वे साबित हो जाएं, तो उन्हें पांच वर्ष से भी अधिक की सजा हो सकती है, जबकि मौजूदा कानून किसी भी सामान्य व्यक्ति को दो वर्ष से अधिक की सजा सुनाए जाने पर चुनाव लड़ने से ही वंचित कर देता है। इस मामले में सुनवाई के दौरान सरकार ने तर्क दिया था कि यदि आपराधिक मामले में दोषी ठहराए गए सदस्यों की सदस्यता रद्द कर दी जाएगी, तो खासतौर से ऐसी सरकारों के समक्ष स्थिरता का संकट पैदा हो सकता है, जो थोड़े बहुमत से सत्ता में होती हैं।
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सर्वोच्च अदालत ने उसका यह तर्क खारिज कर पूरे राजनीतिक वर्ग को आईना दिखाने का काम किया है। सच यह है कि किसी भी सियासी दल का रवैया इस मामले में सकारात्मक नहीं रहा है, वरना संसद से अब तक कोई कड़ा कानून पारित हो गया होता। बेशक यह एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन यह भी जरूरी है कि पर्दे के पीछे चलने वाले खेल पर भी अंकुश लगाया जाए और राजनीति में काले धन के प्रवाह को रोका जाए।

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