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क्रिकेट में साफ-सफाई

Sat, 24 Jan 2015 12:00 AM IST
संपादकीय/अमर उजाला, दिल्ली
संपादकीय/अमर उजाला, दिल्ली Updated Sat, 24 Jan 2015 12:00 AM IST
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editorial supreme court judgement on cricket.

आईपीएल और बीसीसीआई के बीच हितों का जो टकराव शुरू से बिल्कुल साफ दिखता था, उसे सर्वोच्च न्यायालय ने पुष्ट कर निस्संदेह क्रिकेट की खो रही साख लौटाने की जरूरी पहल की है। उसने सिर्फ नारायणस्वामी श्रीनिवासन को क्रिकेट बोर्ड का चुनाव लड़ने से ही नहीं रोका है, बीसीसीआई की दादागीरी और अनियमितता खत्म करने का काम भी किया है।

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देश का सबसे धनी खेल बोर्ड, बीसीसीआई, लगातार कहता आया है कि वह निजी कंपनी है, इसलिए आरटीआई के दायरे में नहीं आती। पर शीर्ष अदालत ने साफ बताया है कि वह जनता के प्रति जवाबदेह है, इसलिए देश के तमाम कानून उस पर आयद होते हैं। आईपीएल में भ्रष्टाचार के खुलासों और कुछ खिलाड़ियों की गिरफ्तारी के बावजूद क्रिकेट बोर्ड लीपापोती में लगा था, तो श्रीनिवासन अपने दामाद को बचाने और बोर्ड अध्यक्ष का पद दोबारा हासिल करने का मंसूबा पाले हुए थे। अब उनके साथ आईपीएल के सीओओ सुंदर रमन और चेन्नई सुपरकिंग्स के कप्तान धोनी के भी नकाब उतर गए हैं।
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मुद्गल कमेटी द्वारा दोषी पाए गए मयप्पन और राज कुंद्रा को छह महीने बाद सजा होनी है, तो श्रीनिवासन को बीसीसीआई और चेन्नई सुपरकिंग्स में से एक को चुनना होगा। सवाल यह है कि जो शख्स बीसीसीआई में नहीं है, और सुप्रीम कोर्ट ने जिनके खिलाफ तीखी टिप्पणियां की हैं, क्या वह आईसीसी के अध्यक्ष पद पर बना रह सकता है। पर याद रखने की जरूरत है कि श्रीनिवासन क्रिकेट की इस कलंक कथा के अकेले खलनायक नहीं हैं।
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आज शरद पवार श्रीनिवासन के हश्र पर खुश हैं, पर वह पवार ही थे, जिन्होंने श्रीनिवासन को चेन्नई सुपरकिंग्स की फ्रेंचाइजी की अनुमति दी थी। पवार यह भी बेहतर जानते होंगे कि हितों के टकराव का मामला सिर्फ श्रीनिवासन से नहीं, कहीं न कहीं उनके परिवार से भी जुड़ा है। और यह सूची पवार से भी आगे जाती है। जब श्रीनिवासन तमाम नियम-कानूनों को धता बताकर बीसीसीआई अध्यक्ष बने रहने पर तुले थे, तब भी बोर्ड के ज्यादातर अधिकारी उनके साथ थे, आज भी सभी उनके विरोध में नहीं हैं। पर शीर्ष अदालत के फैसले के बाद अब बोर्ड में पारदर्शिता से बचा नहीं जा सकता।

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