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साहित्यिक लीक से हटकर

Wed, 24 Oct 2012 08:10 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Wed, 24 Oct 2012 08:10 PM IST
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editorial on sunil gangopadhaya
अपने साहसी, बल्कि दुस्साहसी, कथ्य और सहज-प्रवाहपूर्ण भाषिक प्रयोग के जरिये रवींद्र युग की रहस्यपूर्ण और तत्समबहुल-लच्छेदार बांग्ला भाषा को खत्म कर देने वाले सुनील गंगोपाध्याय अपने व्यक्तित्व और कुल लेखन के जरिये अगर रवींद्रनाथ की ही याद दिलाते हैं, तो यह अस्वाभाविक नहीं है।
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बुद्धदेव बसु और शक्ति चटोपाध्याय के साथ मिलकर उन्होंने जिस आधुनिक बांग्ला साहित्य का सूत्रपात किया, वह भावुकता के बजाय वैज्ञानिक तर्कशक्ति और शहरी बोलचाल की भाषा को अपना आधार बना रहा था। बांग्ला रामायण के कवि कृत्तिवास के नाम पर कविताओं की पत्रिका शुरू कर उसे अशालीन, देहवादी, आक्रामक और प्रयोगशील युवा कविताओं का मुखपत्र बना देना सुनील गंगोपाध्याय से ही संभव था।

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उनकी इस परंपराभंजक सोच के पीछे चर्चित अमेरिकी बीटनिक कवि एलेन गिंसबर्ग के संपर्क का भी प्रभाव था, जो तब कोलकाता में उनके साथी थे। उसी दौर में उनके दो उपन्यासों पर फिल्म बनाकर सत्यजीत राय ने उन्हें देश से बाहर चर्चित कर दिया था। पर सुनील गंगोपाध्याय ने अपनी इस छवि को खंडित नहीं होने दिया, जो बड़ी बात है। बीती सदी के सत्तर के दशक में सेई समय, प्रथम आलो और पूर्बो-पश्चिम के जरिये वह एक अन्वेषक साहित्यकार के रूप में अवतरित हुए, जो बंगाल के पुनर्जागरण को अपनी सहज प्रभावशाली गद्यभाषा में उद्घाटित करते हैं।
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उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध के कोलकाता को चित्रित करता उपन्यास सेई समय सिर्फ बांग्ला नहीं, भारतीय साहित्य की अमूल्य धरोहर है। रचनात्मकता के आखिरी दौर में उन्होंने शिशु साहित्य पर हाथ आजमाया और देखते ही देखते बेहद लोकप्रिय बन गए। नीललोहित के छद्मनाम से उन्होंने किशोरों के लिए काकाबाबू नाम के जिस जासूसी किरदार का ईजाद किया, वह सत्यजीत राय के फेलुदा से कतई उन्नीस नहीं था।


कलकत्ता का नाम कोलकाता रखने और वहां दुकानों के नाम बांग्ला में लिखने के प्रबल पक्षधर सुनील गंगोपाध्याय ने बाद में साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष के रूप में जिस अखिल भारतीय छवि का परिचय दिया, वह उनकी समन्वयवादी सोच का ही परिचायक है। क्या उम्मीद करें कि उनका निधन हिंदी में उनके विपुल साहित्य के प्रसार और मूल्यांकन का अवसर बनेगा!

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