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विकास की विसंगतियों का चितेरा
नई दिल्ली
Updated Fri, 12 Oct 2012 08:28 PM IST
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मो यान को मिला नोबल क्या वाकई चीन से नजदीकी बढ़ाने का पश्चिमी हथकंडा है, क्योंकि अब तक तो उन्हीं चीनी पर नोबल समिति ने कृपादृष्टि दिखाई है, जो कम्युनिस्ट तानाशाही के आलोचक रहे हैं! बेशक इस चर्चित लेखक ने निरंकुश सत्ता से तालमेल बनाकर चलने के लिए ही अपना नाम बदला, यह सच है कि सेंसरशिप को उन्होंने साहित्य सृजन के लिए वरदान माना, यहां तक कि माओ त्से तुंग द्वारा लेखकों के लिए तय किए दिशा-निर्देशों को भी उन्होंने सही ठहराया था, पर इससे उनके साहित्य का महत्व रत्ती भर कम नहीं होता।
मो यान की उपलब्धि यह है कि सत्ता-व्यवस्था से सीधा टकराव मोल लिए बगैर उन्होंने सांस्कृतिक क्रांति की असलियत, ग्रामीण चीन की बदहाली और विकास की विसंगतियों के प्रामाणिक चित्र खींचे। इसके लिए उन्होंने जो जटिल शैली चुनी, वह उनकी लेखकीय प्रतिबद्धता का ही सुबूत है। उनके उपन्यास समकालीन जीवन की बात करते हुए अचानक इतिहास की अतल गहराइयों में उतर जाते हैं।
लोककथाओं से जुड़ाव उन्हें विलियम फॉकनर के नजदीक ले जाता है, सामाजिक यथार्थवाद का चित्रण उन्हें ल्यू शुन के बराबर खड़ा करता है, तो यथार्थ को भ्रम और कल्पना के साथ गड्डमड्ड करने की उनकी शैली जादुई यथार्थवाद के जनक मार्खेज की याद दिलाती है। माओ त्से तुंग की सांस्कृतिक क्रांति उन्हें स्कूल से निकालकर किसानी, मजदूरी और चरवाहे की आजीविका तक ले गई थी, शायद इसीलिए उनकी रचनाओं में कहानी सुनाते पशु भी दिखते हैं।
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पर उनका लेखन कम्युनिस्ट सत्ता की आंखों में धूल झोंकने वाला नहीं, बल्कि आंखों में उंगली डालकर सचाई दिखाने वाला है। उनकी प्रसिद्धि रेड सोरघम से ही हुई, जिसमें कम्युनिस्ट शासन के शुरुआती वर्षों में जापान के हमले और किसानों के कठोर जीवन का चित्रण है। रिपब्लिक ऑफ वाइन में चीन में बढ़ती शराबखोरी और भ्रष्टाचार का उन्होंने जैसा खुलासा किया है, वह हैरान करने वाला है।
इसी तरह फ्रॉग की उस नायिका को भला कौन भूल सकता है, जो थोपे गए परिवार नियोजन कार्यक्रम की कीमत एक के बाद एक गर्भपात के रूप में भुगतती है! अपनी विशिष्ट शैली के जरिये चीनी साहित्य की धारा बदल देने वाले लेखक को सम्मानित कर नोबल समिति ने ठीक ही किया है।
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मो यान की उपलब्धि यह है कि सत्ता-व्यवस्था से सीधा टकराव मोल लिए बगैर उन्होंने सांस्कृतिक क्रांति की असलियत, ग्रामीण चीन की बदहाली और विकास की विसंगतियों के प्रामाणिक चित्र खींचे। इसके लिए उन्होंने जो जटिल शैली चुनी, वह उनकी लेखकीय प्रतिबद्धता का ही सुबूत है। उनके उपन्यास समकालीन जीवन की बात करते हुए अचानक इतिहास की अतल गहराइयों में उतर जाते हैं।
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लोककथाओं से जुड़ाव उन्हें विलियम फॉकनर के नजदीक ले जाता है, सामाजिक यथार्थवाद का चित्रण उन्हें ल्यू शुन के बराबर खड़ा करता है, तो यथार्थ को भ्रम और कल्पना के साथ गड्डमड्ड करने की उनकी शैली जादुई यथार्थवाद के जनक मार्खेज की याद दिलाती है। माओ त्से तुंग की सांस्कृतिक क्रांति उन्हें स्कूल से निकालकर किसानी, मजदूरी और चरवाहे की आजीविका तक ले गई थी, शायद इसीलिए उनकी रचनाओं में कहानी सुनाते पशु भी दिखते हैं।
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पर उनका लेखन कम्युनिस्ट सत्ता की आंखों में धूल झोंकने वाला नहीं, बल्कि आंखों में उंगली डालकर सचाई दिखाने वाला है। उनकी प्रसिद्धि रेड सोरघम से ही हुई, जिसमें कम्युनिस्ट शासन के शुरुआती वर्षों में जापान के हमले और किसानों के कठोर जीवन का चित्रण है। रिपब्लिक ऑफ वाइन में चीन में बढ़ती शराबखोरी और भ्रष्टाचार का उन्होंने जैसा खुलासा किया है, वह हैरान करने वाला है।
इसी तरह फ्रॉग की उस नायिका को भला कौन भूल सकता है, जो थोपे गए परिवार नियोजन कार्यक्रम की कीमत एक के बाद एक गर्भपात के रूप में भुगतती है! अपनी विशिष्ट शैली के जरिये चीनी साहित्य की धारा बदल देने वाले लेखक को सम्मानित कर नोबल समिति ने ठीक ही किया है।