फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Other Archives ›   editorial hashimpura.

छवि पर धब्बा

Sun, 22 Mar 2015 10:30 PM IST
संपादकीय
संपादकीय Updated Sun, 22 Mar 2015 10:30 PM IST
विज्ञापन
editorial hashimpura.

हाशिमपुरा के छियालीस बेगुनाहों की मौत हिरासत में हत्या का भयावह उदाहरण थी, तो करीब अट्ठाइस वर्ष बाद आया उसका फैसला उससे कम हताश करने वाला नहीं है, जिसमें अभियोजन द्वारा पहचान साबित करने में नाकाम रहने के कारण सभी आरोपी रिहा हुए हैं। सरकार, प्रशासन और कानून के राज में ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलेंगे, जिसमें सांप्रदायिक विद्वेष के बीच हमारी व्यवस्था के रक्षक कुछ निर्दोष लोगों को पकड़कर ले जाएं, फिर रात के अंधेरे में उन्हें एक-एक कर गोली मार दें।

विज्ञापन


ऐसी बर्बरता की तुलना या तो नाजी अत्याचारों से की सकती है या आधुनिक दौर में जातियुद्ध के लिए कुख्यात बिहार में बथानी टोला, लक्ष्मणपुर बाथे और शंकरबिगहा में हुए नरसंहारों से, जहां समाज के कमजोर लोग बार-बार सवर्णों की गोलियों का निशाना बने।
विज्ञापन


यह भी नियति का क्रूर व्यंग्य ही है कि बिहार के उन तीन हत्याकांडों को अंजाम देने वाले लोग पिछले कुछ वर्षों में ठीक इसी तरह सुबूतों के अभाव में छूटे हैं, जैसे अब हाशिमपुरा कांड को अंजाम देने वाले रिहा हुए हैं। पर हाशिमपुरा कांड को देश के किसी दुर्गम इलाके में नहीं, राष्ट्रीय राजधानी से पचास-साठ किलोमीटर दूर अंजाम दिया गया था। इसीलिए इस मामले का अभी तक तार्किक परिणति तक न पहुंच पाना दुर्भाग्यपूर्ण है।
विज्ञापन
विज्ञापन


यह सोचकर भी हैरानी होती है कि जिस हत्याकांड ने तब देश-दुनिया को चौंकाया था, जिस नरसंहार की जानकारी देने के लिए चंद्रशेखर ने, जो बाद में प्रधानमंत्री बने, अपने आवास पर प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई थी, और जिस हत्याकांड ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को हाशिमपुरा का दौरा करने के लिए बाध्य किया था, उसकी जांच की जिम्मेदारी सीबीआई को देने के बजाय कांग्रेस की ही तत्कालीन राज्य सरकार ने सीआईडी को दी थी।


इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय तक ने सक्रियता दिखाई, लेकिन अभियोजन का हाल यह था कि बिल्कुल शुरुआत से ही उसने नाकामी का परिचय दिया। बेशक हाशिमपुरा के पीड़ितों के लिए ऊपरी अदालत में जाने का दरवाजा खुला है, पर समाज के कमजोर तबकों को सामूहिक तौर पर निशाना बनाने,और फिर अभियोजन द्वारा ढिलाई बरतने, जिससे पीड़ित न्याय से भी वंचित रहते हैं, की घटनाएं उस देश की छवि के लिए ठीक नहीं, जो अपनी लोकतांत्रिक पारदर्शिता और कानून के राज पर गर्व करता है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed