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ताकि पटरी पर लौटें रिश्ते
Updated Sun, 15 Mar 2015 08:36 PM IST
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की श्रीलंका यात्रा पड़ोसी देशों के साथ बेहतर रिश्ता कायम करने का एक और प्रमाण तो है ही, उनके इस दौरे से हाल के वर्षों में श्रीलंका के साथ हमारे खराब हुए रिश्ते को पटरी पर लाने की प्रतिबद्धता भी दिखाई पड़ी है।
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यूपीए सरकार का पिछला एक दशक विदेश नीति के मोर्चे पर हताश करने वाला ही ज्यादा था। उस दौरान श्रीलंका से हमारे रिश्ते इतने बिगड़े कि पड़ोस में चीन के वर्चस्ववाद का हम कायदे से विरोध करने की स्थिति में भी नहीं रह गए थे। हालांकि श्रीलंका में तमिल अल्पसंख्यकों की खराब स्थिति भी कोलंबो से हमारे कटु रिश्ते की वजह बनती रही है। इसके अलावा तमिल मछुआरों को श्रीलंका के जलक्षेत्र में निशाना बनाने की घटनाएं भी चिंताजनक हैं; प्रधानमंत्री के श्रीलंका में होने के दौरान भी कुछ भारतीय मछुआरों को निशाना बनाया गया। ऐसे में, इस मुद्दे का समाधान दोनों तरफ से संयम की भी मांग करता है।
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बड़ी बात यह कि पिछले दिनों श्रीलंका के चुनाव में चीन समर्थित राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे की हार से दोतरफा रिश्ते के पटरी पर आने की जो झीनी उम्मीद बनी, प्रधानमंत्री मोदी के इस दौरे ने उसे मूर्त रूप देने की पूरी कोशिश की है। सिर्फ यही नहीं कि तमिल बहुल उत्तरी प्रांत की राजधानी जाफना में पहुंचने वाले वह पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने, एकाधिक प्रतीकों के जरिये उन्होंने तमिल हितों से जुड़ी हमारी भावनाओं का सटीक संदेश भी दिया। बेशक वह ऐसा इसलिए भी कर सके, क्योंकि श्रीलंका के नए राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना खुद तमिलों की बेहतरी की दिशा में काम करने की प्रतिबद्धता जता चुके हैं।
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चूंकि श्रीलंका के तमिलों की जड़ भारत में है, ऐसे में, उनकी बेहतरी के लिए आवाज उठाना हमारा कर्तव्य है। अलबत्ता श्रीलंका के साथ हमारे सौहार्दपूर्ण संबंध में दूसरे मुद्दों पर भी संतुलन दिखना चाहिए। मसलन, दोतरफा कारोबार को गति देने के लिए जरूरी है कि हम व्यापार असंतुलन की श्रीलंका की शिकायत पर गौर करें। श्रीलंका में चीन ने जिस व्यापक पैमाने पर निवेश किया है, उसे देखते हुए मानना कठिन है कि सत्ता परिवर्तन होने भर से बीजिंग का वर्चस्व वहां कम हो जाएगा। पर कई ऐसे मोर्चे हैं, जिन पर श्रीलंका के साथ आगे बढ़कर हम दोस्ती की नई इबारत लिख सकते हैं।