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मौद्रिक कवायदों पर भरोसा छोड़ें
Updated Tue, 30 Oct 2012 08:38 PM IST
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अपनी मौद्रिक समीक्षा में रिजर्व बैंक के ब्याज दर न घटाने पर वित्त मंत्री ने जैसी नाखुशी जाहिर की है, वह आर्थिक मोरचे पर सरकार की हताशा का ही परिचायक है। इसमें संदेह है कि सीआरआर के बजाय केंद्रीय बैंक अगर ब्याज दर घटाता, तो अर्थव्यवस्था पर उसका अनुकूल प्रभाव पड़ता ही।
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वस्तुतः कई पश्चिमी देशों में ब्याज दर निम्नतम स्तर पर होने के बावजूद उसका फायदा नहीं मिल रहा, क्योंकि वैश्विक मंदी के कारण मांग नहीं है। दूसरी ओर, जब माहौल अनुकूल नहीं है, तब रिजर्व बैंक द्वारा सीआरआर कम कर बाजार में करीब 17,500 करोड़ की अतिरिक्त नकदी छोड़ने से मांग बढ़ेगी ही, इसकी गारंटी नहीं है।
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पर सरकार का रवैया देखकर लगता है कि अपनी नीतियां सुधारने के बजाय वह मौद्रिक कवायदों के जरिये अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने का ख्वाब पाले हुए है, जबकि विगत में ब्याज दर लगातार बढ़ाने के ऐसे प्रयास विफल ही साबित हुए हैं। आर्थिक चुनौतियों के बीच वित्त मंत्री ने राजकोषीय घाटा कम करने के लिए जो रोडमैप जारी किया है, वह भी हवा-हवाई ही ज्यादा लगता है।
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उसने कदाचित यह मान लिया है कि सरकारी कंपनियों के विनिवेश और स्पेक्ट्रम की बिक्री से वह एक निश्चित मात्रा में राजस्व ले आएगी, और सरकारी खर्च व सबसिडी घटाकर अर्थव्यवस्था को दुरुस्त कर देगी। वर्ष 2016-17 की राजकोषीय घाटे को तीन फीसदी पर ले आने का उनका लक्ष्य इसलिए भी उम्मीद नहीं जगाता, क्योंकि विगत में ऐसे लक्ष्य पूरे नहीं हुए।
यह बहुत पहले से कहा जा रहा है कि वैश्विक स्तर पर मुश्किल आर्थिक स्थिति को देखते हुए सरकार को अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए गंभीर होना चाहिए। पर इसके बजाय यहां आर्थिक सुधार और आर्थिक संरक्षणवादी नीतियों के बीच द्वंद्व ही अधिक दिखता है।
मूल्यवृद्धि का कोई अवसर यह सरकार नहीं छोड़ती; अब रेलवे किराया बढ़ाए जाने के अलावा डीजल पर बोझ और बढ़ाए जाने की तैयारी है, जिनसे मुद्रास्फीति का बढ़ना तय है। ऐसे में थोड़ी-बहुत कतर-ब्योंत करके आप अर्थव्वस्था को कितना सुधार लेंगे! बेहतर हो कि रिजर्व बैंक पर ठीकरा फोड़ने के बजाय सरकार कृषि और घरेलू उद्योग की स्थिति ठीक करे, महंगाई पर अंकुश लगाए और खाद्य पदार्थों के मूल्य स्थिर रखने के लिए हरसंभव उपाय करे।