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क्यों पीछे हैं दिल्ली और मुंबई

Fri, 19 Oct 2012 12:56 AM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Fri, 19 Oct 2012 12:56 AM IST
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editorial 18 oct
नई आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद से बीते दो दशकों में तेजी से शहरीकरण बढ़ा है, मगर इसके साथ ही चुनौतियां भी बढ़ी हैं। यूएन हैबिटेट की ताजा रिपोर्ट इसी ओर इशारा करती है, जिसमें देश की राजधानी दिल्ली और वित्तीय राजधानी मुंबई को दुनिया के समृद्ध शहरों की सूची में शामिल तो किया गया है, मगर वे वियना, न्यूयॉर्क या टोरंटो जैसे शीर्ष महानगरों के आगे कहीं नहीं ठहरते। दुनिया के 95 समृद्ध शहरों की सूची में मुंबई 52वें नंबर पर और दिल्ली 58वें नंबर पर है।
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संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों का आकलन है कि दिल्ली और मुंबई समृद्ध तो हो रहे हैं, लेकिन यहां का बुनियादी ढांचा आज भी कमजोर है। पिछले कुछ वर्षों से जबसे एशिया को आर्थिक विकास की धुरी माना जाने लगा है, और कहा जा रहा है कि अगले डेढ़-दो दशकों में चीन अमेरिका को पीछे छोड़ देगा, हम अकसर अपनी तुलना अपने इस पड़ोसी से करने लगते हैं। मगर यह रिपोर्ट बताती है कि चीनी शहरों- शंघाई और बीजिंग की तुलना में हमारे ये दोनों महानगर काफी पीछे हैं।
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स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्ज सिटीज नामक इस रिपोर्ट में समृद्धि को आंकने के लिए जिन पांच सूचकांकों को-उत्पादकता, जीवन की गुणवत्ता, आधारभूत ढांचा, पर्यावरण और समता, आधार बनाया गया, उन सबमें दिल्ली और मुंबई की हालत दयनीय है। यदि सड़क, बिजली, पानी और शौचालय जैसी बुनियादी सेवाओं की ही बात की जाए, तो भयावह तसवीर सामने आती है। बेशक, इसके लिए इन शहरों में आबादी का बढ़ता दबाव भी बड़ा कारण है, क्योंकि पूरे देश से लोग यहां रोजगार की तलाश में आते हैं। जीवन की गुणवत्ता और समता की बात की जाए, तो ये दोनों शहर विकास की विसंगतियों के सबसे प्रामाणिक उदाहरण हैं।
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दक्षिण मुंबई के नरीमन पॉइंट और धारावी की झोपड़पट्टी में या फिर दक्षिण दिल्ली और यमुनापार की झुग्गी बस्तियों में इन विसंगतियों की तसदीक की जा सकती है। यह विडंबना ही है कि इन शहरों में 60 फीसदी आबादी के पास आय का कोई स्थायी जरिया तक नहीं है। यह बात खुद सरकार ने मानी है। सवाल सिर्फ दिल्ली और मुंबई या देश के अन्य महानगरों का नहीं है, हमारे तमाम शहरों की यही हालत है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने मौका दिया है कि हम एक बार फिर से विकास की अपनी अवधारणा पर विचार करें।
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