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बड़ी लड़ाई से पहले झटका

Updated Sun, 14 Oct 2012 08:34 PM IST
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editorial 14 oct

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जो लोग उपचुनावों के नतीजों को बहुत महत्वपूर्ण नहीं मानते, वे भी उत्तराखंड की टिहरी में मुख्यमंत्री के पुत्र साकेत बहुगुणा की हार और पश्चिम बंगाल के जंगीपुर में राष्ट्रपति के बेटे अभिजीत मुखर्जी की मामूली जीत को गंभीरता से लेंगे। कांग्रेस ने पिछली बार ये दोनों ही सीटें भारी मतों से जीती थीं। ऐसे में इस लचर प्रदर्शन के पीछे महंगाई और भ्रष्टाचार के कारण कांग्रेस के प्रति मतदाताओं का गुस्सा तो है ही, दोनों सीटों पर प्रत्याशियों के चयन में परिवार को वरीयता देने का भी उसे खामियाजा भुगतना पड़ा है।
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उत्तराखंड में कांग्रेस आलाकमान ने स्थानीय आकांक्षाओं की अनदेखी कर विजय बहुगुणा को जिस तरह मुख्यमंत्री बनाया था, वही बहुतों के गले नहीं उतरा था। तिस पर अपने इस्तीफे के बाद खाली हुई सीट पर मुख्यमंत्री ने अपने उस बेटे को प्रत्याशी घोषित कर और भी गलत संदेश दिया, जिसकी राज्य में कोई व्यापक पहचान की बात तो छोड़ें, जिसे एक कांग्रेसी के तौर पर भी नहीं जाना जाता। हैरत तो इस बात पर है कि अपने प्रति मतदाताओं के गुस्से को भी मुख्यमंत्री भांप नहीं पाए।


इसी तरह जंगीपुर में महत्वाकांक्षी अभिजीत मुखर्जी अपने पिता की सीट पर खड़े तो हो गए, लेकिन उन्होंने यह देखने की जहमत नहीं उठाई कि इस दौरान जमीनी हकीकत बहुत बदल गई है। तीन साल पहले जिस जंगीपुर के सातों विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस-तृणमूल आगे थी, पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में भी जहां सिर्फ एक सीट पर माकपा को जीत हासिल हुई थी, इस उपचुनाव में वहां चार विधानसभा सीटों पर माकपा आगे रही।

अल्पसंख्यक-बहुल जंगीपुर में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बड़ी भूमिका निभाता है, यह भाजपा के बढ़े मत प्रतिशतों और अल्पसंख्यक हितों की वकालत करती दो नवगठित पार्टियों को मिले वोटों से भी साबित होता है। ऐसे में राष्ट्रपति के बेटे की महत्वाकांक्षा के आगे हथियार न डालकर कांग्रेस नेतृत्व अगर वहां अल्पसंख्यक प्रत्याशी उतारता, तो मुमकिन है कि उसके वोट में एकाएक 15 प्रतिशत की भारी कमी नहीं आती।

एक के बाद एक घोटाले के खुलासों और सहयोगी पार्टियों के दबावों के बीच टिहरी और जंगीपुर के नतीजे उस कांग्रेस के लिए सचमुच चेतावनी हैं, जिसे इसी साल गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनावों में उतरना है।

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