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रुपये को थामिए

Wed, 19 Jun 2013 09:31 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Wed, 19 Jun 2013 09:31 PM IST
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economic development

पखवाड़े भर पहले ही मुख्य आर्थिक सलाहकार रघुराम राजन ने आश्वस्त करने की कोशिश की थी कि रुपये को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है। वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने भी अर्थव्यवस्था की सेहत को लेकर भरोसा जताया और संकेत दिए हैं कि सरकार जल्द ही आर्थिक सुधारों को गति देगी।

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मगर डॉलर के मुकाबले जिस तरह से रुपया धड़ाम से गिरा है, उससे समझा जा सकता है कि आर्थिक मोर्चे पर सब कुछ ठीक नहीं है। महज तीन महीने के दौरान ही रुपया अपने रिकॉर्ड न्यूनतम स्तर पर है और एक डॉलर के मुकाबले इसकी कीमत 58.77 रह गई है।
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मुद्रा के कमजोर होने का सीधा संबंध अर्थव्यवस्था से है और उससे भी कहीं अधिक आम आदमी से। जब-जब रुपया कमजोर होता है, उसका सीधा असर कच्चे तेल के आयात पर पड़ता है, जिस वजह से पेट्रोलियम उत्पादों के दाम बढ़ जाते हैं।
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पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें आम लोगों की जेब पर चौतरफा मार करती हैं। असल में, रुपये के मूल्य में एक फीसदी का अवमूल्यन होने से थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति में 15 से 20 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी हो जाती है। बेशक रुपये में इस गिरावट के कारक बाहरी हैं, और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं में गिरावट आई है।

अमेरिकी अर्थव्यवस्था में स्थिरता दिखने से मंदी के दौरान वहां दिए गए प्रोत्साहन वापस लिए जा सकते हैं, इससे प्रेरित होकर विदेशी संस्थागत निवेशक भारत से हाथ खींच रहे हैं, जिससे रुपया कमजोर हुआ है। लेकिन इस गिरावट के प्रभाव को कम करने के जैसे उपाय किए जाने चाहिए थे, वैसे दिख नहीं रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि रिजर्व बैंक और सेबी जल्द ही कुछ उपाय करेंगे।


चालू खाता घाटे को कम करना है, तो ऐसे उपाय करने ही होंगे, जिससे रुपया स्थिर हो। इस उथल-पुथल के लिए सोने को भी जिम्मेदार माना जा रहा है। आखिर वित्त मंत्री ने देशवासियों को सलाह दी ही है कि वह एक वर्ष तक सोना न खरीदें। मगर उन्हें उन कारणों की जड़ में जाना चाहिए, जिससे देशी-विदेशी निवेशकों का भरोसा अर्थव्यवस्था पर कायम हो। कड़े आर्थिक फैसलों और कल्याणकारी नीतियों के बीच संतुलन की दरकार है। मगर सवाल है कि ऐसे समय जब आम चुनाव में महज ग्यारह महीने बचे हों, तो जोखिम कौन उठाएगा?

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