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खेल को खेल ही रहने दें

Sun, 09 Mar 2014 07:09 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Sun, 09 Mar 2014 07:09 PM IST
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dont mixed politics in game

मेरठ के सुभारती विश्वविद्यालय प्रशासन ने कुछ कश्मीरी छात्रों के रवैये पर फैसला लेते हुए अगर शुरू में ही परिपक्वता दिखाई होती, तो ग्रेटर नोएडा के एक और निजी विश्वविद्यालय में घटना की पुनरावृत्ति नहीं होती। दोनों ही जगह क्रिकेट मैच देखने के बाद उन छात्रों ने पाकिस्तान के पक्ष में जिस तरह नारेबाजी की, वह घोर आपत्तिजनक थी।

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एशिया कप के उस मैच में पाकिस्तान की टीम का प्रदर्शन भारत से बेहतर था, इसलिए वह जीत गई। खेल में हार-जीत को खेल भावना के साथ लेना चाहिए, इसमें पाकिस्तान के पक्ष में नारे लगाने का तो कोई औचित्य ही नहीं था। उन छात्रों के लिए तो और नहीं, जो कश्मीर से उस उत्तर प्रदेश में पढ़ाई के लिए आए हैं, जो मुजफ्फरनगर की सांप्रदायिक हिंसा की आग से अभी पूरी तरह नहीं उबर पाया है।
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इससे बेखबर उन छात्रों ने न सिर्फ खेल को सांप्रदायिकता के चश्मे से देखने की कोशिश की, बल्कि ऐसा करते हुए पढ़ाई और शिक्षा संस्थान की गरिमा की परवाह भी नहीं की। पर विश्वविद्यालय प्रशासन के रवैये की भी तारीफ नहीं की जा सकती। छात्रावास में हुई उस घटना को वह अपने स्तर पर निपटा सकता था। जिन छात्रों ने ऐसा किया, उन्हें सख्त चेतावनी देने से लेकर दंडित करने और उनके अभिभावकों को जानकारी देने जैसे तमाम विकल्प हो सकते थे।
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पर प्रशासन की शुरुआती अदूरदर्शिता के कारण मामला इतना तूल पकड़ गया कि पुलिस-प्रशासन सक्रिय हो उठा और उन छात्रों के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज करने का फैसला लिया गया। जबकि खुद सर्वोच्च न्यायालय तक कह चुका है कि देशद्रोह का मामला दर्ज करने के लिए षड्यंत्र के ठोस प्रमाणों का होना जरूरी है। इस चूक का नतीजा यह हुआ कि कश्मीर से लेकर पाकिस्तान तक इस घटना की प्रतिक्रिया देखी गई।


जाने-अनजाने समाज में सांप्रदायिक भावना भड़काने की जो कोशिशें होती हैं, वही बहुत दुर्भाग्यजनक हैं, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया में प्रशासन और सरकार से तो जिम्मेदार रवैये की अपेक्षा की जानी चाहिए। हाल के दौर में उत्तर प्रदेश एक के बाद एक सांप्रदायिक वैमनस्य की आग में झुलसता रहा है, ऐसे में, इस तरह की घटनाओं का सामने आना चिंताजनक है। चूंकि लोकसभा का चुनाव सामने है, इसीलिए भी सजग रहने की जरूरत है।

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