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अब भी कुछ कीजिए

Sun, 26 May 2013 11:25 PM IST
Updated Sun, 26 May 2013 11:25 PM IST
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इस विडंबना को आखिर क्या कहेंगे कि छत्तीसगढ़ में ताकत और रणनीति की लड़ाई

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में नक्सली बार-बार प्रशासन-व्यवस्था पर भारी पड़ जाते हैं!

यह संयोग नहीं है कि जिस दौर में नक्सलियों को 'खत्म होती ताकत' बताया जा रहा है, ठीक उसी समय उनके हमले भीषणतम रहे हैं।

तीन साल पहले दंतेवाड़ा में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के करीब अस्सी जवान नक्सली हमले में खेत रहे थे, तो पिछले शनिवार को माओवादियों ने पहली बार किसी राष्ट्रीय पार्टी को इतनी बर्बरता से निशाना बनाया, जिसकी जिम्मेदारी लेने से राज्य की रमन सिंह सरकार बच नहीं सकती।

उसे इस प्रश्न का उत्तर देना ही चाहिए कि जब भाजपा की विकास यात्रा में पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था थी, तो कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा में क्यों नहीं। अगर यह नक्सलियों में नेतृत्व परिवर्तन के बाद अपनी ताकत दिखाने का उदाहरण है, तब तो यह प्रशासन के साथ-साथ खुफिया व्यवस्था की चूक का भी सुबूत है।
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छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव से करीब छह महीने पहले उस कांग्रेस के लिए यह बड़ा झटका है, जो आदिवासियों के बीच पैठ बनाने के लिए कुछ भी करने को तैयार थी। उसने इस हमले पर जैसा रुख दिखाया है, वह भी कमोबेश समझ में आता है।
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लेकिन दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों को यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि माओवाद से निपटने के लिए उन्होंने अब तक कुछ किया नहीं है। जहां तक रमन सिंह सरकार का सवाल है, तो उसे माओवादियों का विरोधी माना जाता है, लेकिन जब-तब उस पर माओवादियों से साठगांठ के आरोप भी लगते हैं! कांग्रेस का रवैया भी कम लचर नहीं।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कभी नक्सलवाद को सबसे बड़ा खतरा बताया था और गृह मंत्री रहते हुए पी चिंदबरम ने ऑपरेशन ग्रीन हंट शुरू किया था। लेकिन सीआरपीएफ की तैनाती को छोड़कर कुछ ठोस प्रयास नहीं हुए।


इन अर्धसैनिक बलों को भी न तो अत्याधुनिक तकनीकों से लैस किया गया, न ही उन्हें स्थानीय स्तर पर समर्थन मिला। बेशक दरभा में हुए हमले के बाद कुछ दिनों तक राजनीति से लेकर प्रशासन-व्यवस्था तक थोड़ी चुस्ती देखने को मिले, लेकिन इस तरह की फौरी राजनीति में नक्सल समस्या के स्थायी समाधान की उम्मीद बहुत कम है।

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