फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Other Archives ›   Do something!

कुछ तो कीजिए

Sun, 22 Jun 2014 08:24 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Sun, 22 Jun 2014 08:24 PM IST
विज्ञापन
Do something!

इराक के गृहयुद्ध में विद्रोही आईएसआईएल की ताकत का बढ़ते जाना सिर्फ उस मुल्क के लिए नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया समेत पूरे विश्व के लिए बेहद चिंताजनक है। सीरिया की सीमा से लगी सामरिक रूप से महत्वपूर्ण चौकी पर चरमपंथियों के कब्जे के बाद जहां सीरिया से लड़ाकों का इराक में घुसने का रास्ता खुल गया है, वहीं अनबार प्रांत में महज दो दिनों में चौथे शहर पर उनका नियंत्रण प्रतिरोध की ताकतों के निरंतर कमजोर होते जाने का ही प्रमाण है।

विज्ञापन


इराक की बदतर होती स्थिति भारत के लिए इसलिए भी बहुत चिंतनीय है, क्योंकि वहां फंसे भारतीयों को निकालकर लाने की कोई योजना अभी तक अमल में नहीं लाई जा सकी है। मोसुल में अगवा किए गए चालीस भारतीयों में से एक भले चरमपंथियों के कब्जे से निकल भागा है, पर वह अब भी इराक में है ही। इस बीच इक्का-दुक्का लोगों के इराक से लौटकर आने की सुखद सूचनाएं भी हैं, पर उनके बारे में अभी सिर्फ उम्मीद ही की जा सकती है, जो वतन लौटने के लिए व्याकुल तो हैं, पर उनके लौटने की कोई सूरत बनती नहीं दिखाई देती।
विज्ञापन


बेशक चरमपंथियों के सामने वहां की सरकार जिस तरह लाचार दिखने लगी है, उसमें भारत जैसे मुल्कों की चुनौतियां बढ़ गई हैं, क्योंकि वे अगवा किए गए लोगों की सुरक्षित वतन वापसी के बारे में कहें भी तो किससे! आखिर खाड़ी युद्ध के समय करीब डेढ़ लाख भारतीयों को इराक और कुवैत से सुरक्षित निकाल लाने में हमारी सरकार सफल हुई ही थी। लेकिन यह भी सच है कि इराक संकट पर शुरू से ही जो सजगता दिखाई जानी चाहिए थी, हमारी सरकार ने वह नहीं दिखाई। यह ठीक है कि उसे केंद्र की सत्ता में आए अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, पर इराक में भी चीजें कोई अचानक नहीं बदली हैं। वह पिछले काफी समय से सुलग रहा था।
विज्ञापन
विज्ञापन


ऐसी सूचनाएं हैं कि कई इराकी कंपनियों ने वहां काम करने वाले भारतीयों के पासपोर्ट जबरन अपने पास रख लिए हैं। ऐसे मामलों में सरकार की ओर से मानवीय पहल तो होनी ही चाहिए। इसी तरह इराक के जो इलाके अभी हिंसा से दूर हैं, कम से कम वहां से तो भारतीयों को निकाल लाने की आपात योजना होनी ही चाहिए। इराक हिंसा और अनिश्चय की ओर जिस तरह बढ़ रहा है, उसे देखते हुए वहां फंसे भारतीयों को नियति के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed