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बदले दौर में दिवाली
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Wed, 22 Oct 2014 08:50 PM IST
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बदलते समय की छाप हमारे किसी उत्सव पर अगर सबसे अधिक पड़ी है, तो वह दिवाली है। नई अर्थनीति ने करीब दो दशक पहले दिवाली को खासकर उत्तर भारत के शहरी-महानगरीय इलाकों में रोशनी की चकाचौंध, पटाखों के उद्दाम विस्फोट और उपहारों के आदान-प्रदान के विराट अवसर में परिवर्तित कर दिया था।
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और इस बार ठीक दिवाली से पहले ऑनलाइन खरीदारी ने मॉल और बड़े दुकानों की त्योहारी बिक्री को पीछे छोड़ बाजार में आ रहे बदलाव को रेखांकित किया है। यह बदलाव इतना बड़ा है कि आने वाले दिनों में बड़े-बड़े दुकानों और चमचमाते मॉल्स की चमक फीकी पड़ने की बात की जा रही है। चूंकि प्रति व्यक्ति आय बढ़ी है और गरीबों की संख्या में कमी आई है, इसलिए दिवाली के अवसर पर सोने की बढ़ी मांग, कार, इलेक्ट्रॉनिक सामान व स्मार्टफोन की बढ़ी हुई बिक्री और शेयर बाजार में बनी मजबूती को समझा जा सकता है। हमारा महत्वपूर्ण त्योहार होने और विदेशों में बसे भारतीयों की धमक बढ़ने से दिवाली की एक वैश्विक पहचान बन चुकी है, ऐसे में घरेलू के साथ-साथ बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी इसे अपना कारोबार बढ़ाने के एक अवसर के रूप में देखती हैं।
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अलबत्ता इस अवसर पर दीपोत्सव के सांस्कृतिक अर्थ को नहीं भूलना चाहिए। प्रकाश का यह उत्सव वस्तुतः हमारे जीवन में व्याप्त अंधेरों और कमियों को दूर करने का मौका भी है। बेशक हम आगे बढ़े हैं, पर इस समृद्धि में सबका साझा होना चाहिए। यहां तो हाल यह है कि कुछ लोगों ने करीब अट्ठाईस लाख करोड़ रुपये काला धन के रूप में स्विस बैंकों में जमा कर रखे हैं। तरक्की की दौड़ में गांव का भारत शहरों और महानगरों के बराबर आए, तभी बात बनेगी।
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गांवों और छोटे कस्बों में जो भारत बसता है, वहां भी दिवाली का ऐसा उल्लास हो, तभी इस उत्सव की सार्थकता है। इसी तरह चांद और मंगल तक पहुंचने वाला भारत अगर दिवाली में पटाखों की दुकानों में लगने वाली आग और लोगों को बीमार कर देने वाली मिलावटखोरी को नहीं रोक पाता, तो चिंता की बात है। बल्कि पर्यावरण-सजग इस दौर में दिवाली का उत्सव पटाखों को हतोत्साहित करने का भी अवसर होना चाहिए। जो सोशल मीडिया युवा वर्ग को तमाम मुद्दों पर सक्रिय करता है, वह दिवाली के अवसर पर पर्यावरण को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।