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सांसों में घुलता जहर
नई दिल्ली
Updated Tue, 06 Oct 2015 07:34 PM IST
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राजधानी दिल्ली की आबोहवा को लेकर निरंतर मिलती चेतावनी का लगता है, कुछ असर नहीं हुआ है। सर्वोच्च अदालत ने अब केंद्र और राज्य सरकारों के साथ ही नगर निगम से बृहस्पतिवार तक दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण को रोकने की योजना बताने के लिए कहा है। इससे पता चलता है कि हालात कितने गंभीर हो चुके हैं।
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1990 के दशक में डीजल के काले धुएं और उद्योगों की वजह से होने वाले प्रदूषण को लेकर चलाए गए लंबे अभियानों के बाद सीएनजी और मेट्रो ट्रेनें चलाने जैसे उपाय किए गए थे। मगर बढ़ती आबादी और वाहनों के दबाव में ऐसे सारे उपाय आज बेमानी साबित हो गए हैं। कुछ महीने पहले नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बढ़ते प्रदूषण के लिए जिम्मेदार माने जाने वाले दस वर्ष पुराने डीजल वाहनों पर रोक लगाने का आदेश जरूर जारी किया था, पर वह अब तक पूरी तरह से अमल में नहीं आ सका है।
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एनजीटी में हुई सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई थी कि दिल्ली में आसपास के राज्यों से प्रवेश करने वाले ट्रक जैसे भारी वाहन प्रदूषण फैलाने में सबसे अहम भूमिका निभा रहे हैं। सर्वोच्च अदालत में सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वायरमेंट की याचिका से संबंधित ताजा सुनवाई के दौरान भी इस तथ्य को रेखांकित किया गया है और बताया गया है कि दिल्ली में हर रात 52 हजार से भी अधिक ट्रक प्रवेश करते हैं और यहां तेजी से बढ़ रहे प्रदूषण में एक तिहाई की हिस्सेदारी करते हैं।
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यह कैसा विरोधाभास है कि देश में एक ओर स्मार्ट सिटी बनाए जाने की बातें हो रही हैं, मगर आज दिल्ली सहित देश के 13 शहर दुनिया के शीर्ष बीस प्रदूषित शहरों में शुमार हैं! दिल्ली में हर साल 3,000 बच्चों की मौत इसी प्रदूषण की वजह से होती है।
प्रदूषण के स्तर का हाल यह है कि सांसों की बीमारी के लिए जिम्मेदार माने जाने वाले पीएम 2.5 का स्तर दिल्ली में मान्य दस माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की तुलना में 153 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया है। न्यूयॉर्क, लंदन, सिंगापुर या मॉस्को जैसे शहरों को छोड़ दें, जहां इसका स्तर क्रमशः 14, 16, 17 और 22 माइक्रोग्राम है, तो बीजिंग तक में यह 56 माइक्रोग्राम ही है। जाहिर है, तुरंत सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यहां की आबोहवा सांस लेने लायक भी नहीं रह जाएगी।