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ओबामा से मोहभंग
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Thu, 06 Nov 2014 07:44 PM IST
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अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों के उपचुनाव के नतीजे बताते हैं कि आठ वर्ष पूर्व देश की कमान संभालने वाले बराक ओबामा का जादू फीका पड़ गया है। अब सीनेट और प्रतिनिधि सभा में रिपब्लिकन पार्टी बहुमत में आ गई है, जिससे उसे दो वर्ष बाद होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में अपना आधार बढ़ाने में मदद मिलेगी। इसके अलावा वह ओबामा प्रशासन की नीतियों को भी प्रभावित करने की कोशिश करेगी।
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संभवतः ओबामा को भी इस बात का अंदाजा है, इसीलिए उन्होंने नतीजों के बाद साफ किया कि यदि उनकी बहुचर्चित स्वास्थ्य योजना यानी ओबामा केयर में संशोधन की कोशिश की गई, तो वह वीटो कर देंगे! बेशक, अमेरिकी संविधान ने उन्हें यह अधिकार दे रखा है, पर उपचुनाव के नतीजे बताते हैं कि उनकी लोकप्रियता में हाल के वर्षों में काफी कमी आई है। यदि अमेरिका के पिछले डेमोक्रेट राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के कार्यकाल से तुलना करें, तो क्लिंटन के दूसरे कार्यकाल के अंतिम वर्ष 1998 में हुए उपचुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने जीत दर्ज की थी। हालांकि खुद ओबामा जब पहली बार राष्ट्रपति चुने गए थे, तो उनकी लोकप्रियता सातवें आसमान पर थी और उसे एक बड़े बदलाव की तरह देखा गया था। मगर दूसरे कार्यकाल के शुरू से ही उनका प्रशासन पश्चिम एशिया को लेकर असमंजस में दिखा है।
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इराक और सीरिया में इस्लामिक स्टेट की बढ़ती ताकत को रोकने में भी वह नाकाम रहा है। यही नहीं, अफगानिस्तान में तालिबान के एक धड़े से बात करने की उसकी कोशिशों ने भी आतंकवाद के खिलाफ उसकी प्रतिबद्धता को संदेह के घेरे में ला दिया। दूसरी ओर घरेलू मोर्चे पर देखें, तो अर्थव्यवस्था जरूर पटरी पर आती दिखी है, लेकिन बेरोजगारी अब भी ओबामा प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है।
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जहां तक भारत की बात है, तो पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के रिश्ते ठंडे पड़े हुए थे, जिसमें नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद जरूर कुछ गर्मी आई है। मगर, यह नहीं भूलना चाहिए कि आउटसोर्सिंग और वीजा के मुद्दे पर भारत ओबामा प्रशासन के निशाने पर रहा है। वहीं आठ-नौ वर्ष पूर्व जॉर्ज बुश के कार्यकाल के समय हुए परमाणु समझौते को लेकर भी गतिरोध अब तक नहीं टूटा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अमेरिकी कांग्रेस में रिपब्लिकन पार्टी के दबदबे से भारत समर्थक लॉबी सक्रिय होगी।