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दागियों के दलदल में

Fri, 14 Mar 2014 07:58 PM IST
अमर उजाला नई दिल्ली
अमर उजाला नई दिल्ली Updated Fri, 14 Mar 2014 07:58 PM IST
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In the dirt of convicted law makers

राजनीति को साफ-सुथरा करने की राजनीतिक पार्टियों की बातें हकीकत में कितनी खोखली हैं, एक बार फिर इसका खुलासा दागी और बाहुबलियों को दिए जा रहे चुनावी टिकट से होता है। दागियों को बचाने का अध्यादेश फाड़कर और लोकपाल विधेयक को संसद से पारित कराकर जिन राहुल गांधी ने पारदर्शिता को तवज्जो देने का संदेश दिया था, अब उन्हीं की पार्टी से पवन बंसल और सुबोधकांत सहाय जैसों को मिला टिकट कुछ और बताता है।

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पवन बंसल के खिलाफ भले कोई मामला नहीं था, लेकिन भांजे के भ्रष्टाचार के कारण उन्हें रेल मंत्रालय से विदा होना पड़ा था, जबकि एक नजदीकी कंपनी को कोल ब्लॉक आवंटित करने के कारण सुबोधकांत सहाय को मंत्री पद छोड़ना पड़ा था।
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इसी तरह खनन मामले में लोकायुक्त की रिपोर्ट पर मुख्यमंत्री पद से हटने वाले बी एस येदियुरप्पा को पार्टी में वापस लाकर और अब उन्हें टिकट देकर भाजपा ने साफ कर दिया है कि भ्रष्टाचार के मामले में वह भी दूध की धुली नहीं है। उसने कर्नाटक में येदियुरप्पा के एक नजदीकी को भी टिकट दिया है, और सुषमा स्वराज के विरोध के बावजूद बी श्रीरामुलु को भी।
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ए राजा और दयानिधि मारन को लोकसभा प्रत्याशी के तौर पर चुनकर द्रमुक ने भी यही जाहिर किया है कि इस मुद्दे पर उत्तर और दक्षिण की राजनीति में कोई फर्क नहीं है। मामला सिर्फ दागियों का ही नहीं है; अकेले उत्तर प्रदेश में विभिन्न पार्टियों से बाहुबलियों की जो जमात लोकसभा चुनाव लड़ने जा रही है, उसकी सूची स्तब्ध करने वाली है।

राजनीति के अपराधीकरण पर अंकुश लगाने की दिशा में चुनाव आयोग की लगातार कोशिशों को हमने निष्फल होते देखा है। इस दिशा में शीर्ष अदालत की पहल जरूर थोड़ी उम्मीद जगाती है, जिसने अभी थोड़े ही दिनों पहले भ्रष्ट जनप्रतिनिधियों के खिलाफ चल रहे मामलों को एक साल के भीतर निपटाने का महत्वपूर्ण निर्देश निचली अदालतों को देकर राजनीतिक जमात को संदेश देने की कोशिश की है।


लेकिन उससे सबक लेना तो दूर, सलमान खुर्शीद जैसे मंत्री न्यायपालिका के कामकाज पर टिप्पणी कर पूरी राजनीतिक जमात की मंशा ही स्पष्ट करते हैं। ऐसे में, राजनीति के भीतर से राहुल गांधी या सुषमा स्वराज जैसों की पहल का तो वैसे भी बहुत अर्थ नहीं है।

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