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आर्थिक सुधार की दिशा

Fri, 13 Mar 2015 08:50 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 13 Mar 2015 08:50 PM IST
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Direction of economic reforms

बीमा कानून संशोधन विधेयक को संसद से पारित करवाने में सफल होने पर केंद्र सरकार उचित ही थोड़ी राहत महसूस कर सकती है। जिस विधेयक पर पिछले कई वर्षों से रस्साकशी चल रही थी, उसे यह सरकार बराक ओबामा की विगत भारत यात्रा से पहले पारित कराना चाहती थी, जो संभव नहीं हो पाया था। अब भी इसे पारित कराने के लिए सरकार को मशक्कत करनी पड़ी है। पर बेहतर आर्थिक संकेतों के बीच इस विधेयक के पारित होने का संदेश कहीं ज्यादा बड़ा है। उद्योग जगत ने भी स्वाभाविक ही इसका स्वागत किया है।

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बीमा क्षेत्र में सीधा विदेशी निवेश 26 फीसदी से बढ़ाकर 49 प्रतिशत करने से इस क्षेत्र में पैसा आने के साथ नई कंपनियां भी आएंगी, और प्रतिद्वंद्विता भी बढ़ेगी, जिसका फायदा उपभोक्ताओं को मिलने की बात कही जा रही है। बीमा क्षेत्र में निवेश चूंकि लंबी अवधि के लिए होते हैं, ऐसे में अधिक फंड इकट्ठा होने पर वह इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के भी काम आएगा। इससे उस पेंशन क्षेत्र का महत्व और बढ़ने की भी उम्मीद है, जिसका लाभ देश की बड़ी आबादी को नहीं मिलता।
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पर प्रश्न यह है कि इससे किसानों और आम आदमी का जीवन कितना बदलेगा। क्या इससे फसल बीमा का स्वरूप बदलेगा, ताकि आपदा के समय किसानों को फसल की बर्बादी के अनुरूप मुआवजा मिल सके? क्या इससे आम उपभोक्ताओं द्वारा संचय के लिए जोड़े गए पैसों की वापसी सुनिश्चित होगी? अपने देश में बीमे के प्रति आम जागरूकता कम ही है; यहां बीमा पॉलिसियां बेहतर भविष्य के बारे में सोचते हुए दीर्घावधि लाभ के तौर पर कम और आयकर छूट का फौरी फायदा लेने के लिए ज्यादा ली जाती हैं। तिस पर बीमा पॉलिसियों के बारे में एजेंटों द्वारा पूरी जानकारी न देने की शिकायतें भी आम हैं।
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कुछ निजी कंपनियों के आने का भी उतना फायदा नहीं हुआ, जितनी अपेक्षा थी। जरूरत आम लोगों को बीमा के बारे में जागरूक करने की भी है। हालांकि संशोधित विधेयक में उपभोक्ताओं के हित में कई प्रावधान रखे गए हैं, पर इसका लाभ तभी मिलेगा, जब ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने के साथ आम उपभोक्ताओं के हितों की भी सुरक्षा सुनिश्चित हो।

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