विकास बनाम धर्मांतरण
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धर्मांतरण और पुनर्धर्मांतरण की बहस के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और एनडीए सरकार के गठन के बाद से हिंदुत्व के अपने पुराने एजेंडे की धार तेज कर रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के बीच विकास के मुद्दे पर बात होने की खबर आई है। सरकार गठन के बाद पिछले महीने संसद के शीतकालीन सत्र के अंतिम दिनों में पहली बार मोदी सरकार को अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने में मुश्किल पेश आई थी, जब संघ परिवार के 'घर वापसी' कार्यक्रम को लेकर विपक्ष ने संसद नहीं चलने दी। सरकार को भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन और दिल्ली की अवैध कॉलोनियों को वैध करने जैसे फैसलों को अध्यादेश के जरिये लाना पड़ा है। मगर वह यह जानती है कि यह वैकल्पिक व्यवस्था है और जल्द ही इन्हें उसे संसद से पारित करवाना होगा। इसके बावजूद संघ परिवार के विभिन्न संगठन लगातार धर्मांतरण के मुद्दे को आगे बढ़ा रहे हैं।
यह सब अचानक नहीं हुआ है। असल में संघ की विचारधारा भारत को एक हिंदू राष्ट्र मानती है। उसके आनुषांगिक संगठनों को लगता है कि हिंदुत्व के इस एजेंडे को पूरा करने का इससे अच्छा अवसर और दूसरा नहीं हो सकता, जब देश में पहली बार भाजपा के बहुमत वाली सरकार आई है। लिहाजा जो संघ खुद को सांस्कृतिक संगठन बताता रहा है और भाजपा की राजनीति से खुद को अलग दिखाने की कोशिश करता आया है, वह पहली बार इतने खुले रूप में देश के राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया है।
अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई में बनी एनडीए सरकारों के समय ऐसी स्थिति नहीं थी, और तब भाजपा ने सहयोगी दलों के साथ समन्वय बनाने के लिए हिंदुत्व के मुद्दों को स्थगित कर रखा था। मगर अभी भाजपा पर सहयोगी दलों का वैसा दबाव नहीं है। तो फिर परेशानी क्या है?
दरअसल मोदी को जनादेश विकास के मुद्दे पर मिला है और वह चाहते हैं कि संघ ऐसा अनुकूल माहौल तैयार करे, जिससे उनकी सरकार विकास के अपने एजेंडे को आगे बढ़ा सके। वित्त मंत्री अरुण जेटली का भी कहना है कि सरकार का फोकस विकास पर है, पर धर्मांतरण जैसे मुद्दे का सुर्खियों में होना चिंता की बात है। इसके बावजूद यह सरकार को ही सुनिश्चित करना है कि हिंदुत्व के अपने एजेंडे के लिए बेताब हो रहे संघ परिवार के घटक विकास के उसके एजेंडे को पटरी से न उतारें।