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नेपाल से भारत तक तबाही

Sun, 26 Apr 2015 08:11 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Sun, 26 Apr 2015 08:11 PM IST
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devastation from Nepal to India

हमारा पड़ोसी देश नेपाल भूकंप की जिस त्रासदी से दो-चार हुआ है, वह केवल रिक्टर स्केल पर तीव्रता के लिहाज से नहीं, बल्कि तबाही के लिहाज से भी भीषण है। 1934 का जो भूकंप हमारी स्मृति में एक दुःस्वप्न की तरह गड़ा हुआ है, इसे उसके बाद का सबसे बड़ा भूकंप बताया जा रहा है, तो यह नेपाल में बर्बादी के मंजर को देखकर समझ में आता है।

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वहां मरने वालों का आंकड़ा जिस तरह बढ़ता जा रहा है, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भूकंप ने वहां कितने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई होगी। धरहरा टावर का ध्वस्त हो जाना और माउंट एवरेस्ट के कई बेस कैंपों में हुई तबाही तो विध्वंस के नमूने भर हैं। यह तबाही ऐसे समय आई, जब पर्यटन का मौसम चरम पर था और लाखों पर्यटक वहां मौजूद थे। हालांकि राहत कार्य बड़े पैमाने पर शुरू हो चुका है, जिसमें भारत की भी महत्वपूर्ण भूमिका है, इसके बावजूद नेपाल के पुनर्निर्माण की चुनौती बहुत बड़ी है।
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चिंताजनक बात यह है कि भूकंप के झटके दूसरे दिन भी आए, जिस कारण नेपाल में राहत कार्य में बाधा पहुंची, तो भारत में जान-माल की क्षति बढ़ी। अपने यहां खासकर बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में भूकंप से तबाही हुई है। यही नहीं, इस त्रासदी ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली समेत दूसरे शहरों-महानगरों में भूकंप से बचाव के प्रति हमारी आम लापरवाही और सरकारी उपेक्षा, दोनों को फिर से रेखांकित किया है। ऐसी हर त्रासदी के बाद भूकंप-रोधी निर्माण की जरूरत पर चर्चा होती है, लेकिन कुछ दिनों के शोर-शराबे के बाद जीवन अपने पुराने ढर्रे पर चलने लगता है।
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नई विकास नीति में शहरीकरण को तरजीह दी गई है, पर ज्यादातर शहरों में मानकों का उल्लंघन करके जिस तरह निर्माण कार्य किए जा रहे हैं, वे कभी भी विनाश की वजह बन सकते हैं। स्मार्ट सिटी का हल्ला बहुत है, लेकिन लोगों और बिल्डरों को नियमों के अनुरूप निर्माण कार्य करने के लिए प्रोत्साहित और जागरूक करने की योजना शायद ही दिखती हो।


सरकारी उदासीनता का आलम यह है कि डिजास्टर मैनेजमेंट ऐक्ट के बने हुए एक दशक हो गए हैं, लेकिन इसके अनुरूप राष्ट्रीय प्रबंधन योजना पर अभी काम शुरू नहीं हुआ है। ऐसे में, भूकंप जैसी आपदा से राष्ट्रीय स्तर पर कैसे निपटा जाएगा, यह वाकई एक बड़ा सवाल है।

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